भावार्थ:
संयमरूप यज्ञ: एकान्तकाल में अपनी इन्द्रियों को विषयों में प्रवृत न होने देना। पूरा संयम तभी समझना चाहिये, जब इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि तथा अहम – इन सबसे से राग-आसक्ति का सर्वथा अभाव हो जाय।
विषय-हवनरूप यज्ञ: व्यवहार कालमें इन्द्रियों का विषयों से संयोग होने पर भी उनमें राग-दुवश पैदा न होने देना।
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ है। यह चार पुरुषार्थ को करना ही मनुष्य जीवन का उदेश्य है। उद्देश्य इसलिये है क्योंकि इन चार पुरुषार्थ को करने से ही मनुष्य का कल्याण है। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, का अर्थ क्या है? यह पुरुषार्थ करने से मनुष्य का कल्याण किस प्रकार है? धर्म धर्म का अर्थ है कर्तव्य। श्रीमद […]
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