श्रीमद भगवद गीता : अध्याय २

अध्याय २ – अर्जुन पर मूढ़ता छा जाने के कारण, अर्जुन युद्ध करने के लिये पूर्ण रूप से इंकार कर देते है। भगवान श्रीकृष्ण के समक्ष एक विकट परिस्थिति उत्पन्न हो जाती है। कारण की अर्जुन ने युद्ध का त्याग युद्ध क्षेत्र में युद्ध आरम्भ होने ही वाला था, तब किया। अतः भगवान श्रीकृष्ण का यह प्रयास था की वह अर्जुन को पुनः युद्ध के लिये प्रीरित करे। और यह कार्य शीघ्रता से हो।

जिन-जिन कारणों से अर्जुन में मूढ़ता आई थी, उन सब कारणों का निवारण हेतु तीन प्रकार से अर्जुन को युद्ध करने के लिये प्ररित करने का प्रयत्न करते हैं।

सर्व प्रथम अर्जुन को स्वजनों की मृत्यु का भय था। इसके लिए भगवान श्रीकृष्ण सांख्य विषयक ज्ञान देते है।
दूसरा अर्जुन का भाव था कि युद्ध करने से उसका और उसके कुल के मान, प्रतिष्ठा का हनन होता है। अतः समाजिक दृष्टि से युद्ध करना क्यों आवश्यक है, इस विषय में कहते है।
तीसरा अर्जुन विषाद से भरा था। अतः उस विषाद से मुक्त करने के लिये भगवान् श्रीकृष्ण:

समता क्या है?
समता किस प्रकार प्राप्त की जा सकती है?
कामना उत्पन्न होने का कारण क्या है और उससे मुक्ति किस प्रकार है?
समता प्राप्ति में बाधा क्या है और वह बाधा कितने गहन है?
समता में स्थित होने क्यों अनिवार्य है और उसका क्या लाभ है?

इन सब विषयों पर अपना वक्तव्य रखते है।

श्लोक ४ से श्लोक ९ - अर्जुन का युद्ध के त्याग के कारण और किसी भी प्रकार शोक दूर न होने की सम्भावना का वर्णन

||२-४|| अर्जुन ने कहा: हे मधुसूदन! मैं रणभूमि में किस प्रकार भीष्म और द्रोण के साथ बाणों से युद्ध करूँ? हे अरिसूदन, वे दोनों ही पूजनीय हैं।

||२-५|| इन महानुभाव एवं गुरुजनों की हत्या कर राज्य के सुख भोगने की अपेक्षा, इस लोक में भिक्षा का अन्न ग्रहण करना अधिक श्रेष्ठ है। अर्थ (राज्य) की कामना से गुरुजनों की हत्या करने पर मैं इस संसार में जो सुख भोगूँगा वह रक्तरंजित भोग ही तो होगा?

||२-६|| हम नहीं जानते कि युद्ध करना अथवा न करना – इन दोनों में से कौन-सा कार्य अत्यन्त श्रेष्ठ है। और हमें यह भी पता नहीं कि, हम उन्हें जीतेंगे अथवा वे हमें जीतेंगे। जिनको मारकर हम जीना भी नहीं चाहते, वे ही धृतराष्ट्र के सम्बन्धी हमारे सामने युद्ध के लिए खड़े हैं।

||२-७|| कायरता के दोष से ग्रस्त होना मेरा स्वभाव नहीं है। परन्तु धर्म के विषय से संभ्रमित हुआ, मैं आपसे पूछता हूँ, कि मेरे लिये जो निश्चित ही श्रेयष्कर हो, उसे आप कहिये। क्योंकि मैं आपका शिष्य आपकी शरण में आये हूँ। आप मुझे शिक्षा दीजिये।

||२-८|| पृथ्वी पर निष्कण्टक, समृद्ध और शत्रुरहित राज्य मिल जाय और स्वर्ग में देवताओं के स्वामित्व को प्राप्त होकर भी, जो इन्द्रियों को सुखाने वाला मेरा शोक है, वह दूर हो जाय – ऐसा मैं नहीं देखता हूँ।

||२-९|| संजय ने कहा: इस प्रकार गुडाकेश परंतप अर्जुन ने अन्तर्यामी भगवान् हृषीकेश से यह कहकर कि हे गोविन्द “मैं युद्ध नहीं करूँगा” चुप हो गये।

श्लोक १० से श्लोक ३० - सांख्य (ज्ञान) योग

।।२-१०।। हे भारत वंशोद्भव! दोनों सेनाओं के मध्य भाग में विषाद करते हुए उस अर्जुन के प्रति हँसते हुए-से भगवान् हृषीकेश ने यह वचन कहे।

।।२-११।। श्री भगवान् ने कहा: जिनके लिये शोक करना उचित नहीं है, उनके लिये तुम शोक करते हो और प्रज्ञावानों के से वचनों को कहते हो। जो पण्डित होते है, वह मृत और जीवित दोनों के लिये शोक नहीं करते।

।।२-१२।। वास्तव में न तो ऐसा ही है कि, किसी काल में, मैं नहीं था, तुम नहीं थे, अथवा ये राजालोग नहीं थे। ऐसा भी नहीं है कि, भविष्य में हम सब लोग नहीं रहगे।

।।२-१३।। जैसे देहधारि के इस देह में शिशु, कुमार, युवा और वृद्धावस्था होती है, उसी प्रकार देह के अन्त की प्राप्ति  होती है। उस देहान्त पर धीर मनुष्य मोहित नहीं होता।

।।२-१४।। हे कुन्तीपुत्र! इन्द्रियों के विषय (संसार) सुख और दुःख देने वाले तो हैं। परन्तु शीत और उष्ण के समान आने-जाने वाले हैं। हे भारत! इन अनित्य विषयों-परिस्थिति को तुम महत्व मत दो।

।।२-१५।। पुरुषों में श्रेष्ठ पुरुष को अनित्य विषय व्यथित नहीं करते। जो धीर पुरुष सुख-दुःख में सम भाव रहता है, वह अमृतत्व को प्राप्त हो जाता है।

।।२-१६।। असत् का तो भाव (सत्ता) विधमान नहीं है, और सत् का कभी अभाव विधमान नहीं है। तत्वदर्शी महापुरषों ने दोनों ही तत्व को देखा अथार्त अनुभव किया है।

।।२-१७।। अविनाशी तो उस तत्व को जान, जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है। इस अविनाशी का नाश करने में कोई भी समर्थ नहीं है।

।।२-१८।। इस नित्य, अविनाशी और अप्रमेय (इन्द्रियों एवम बुद्धि के द्वारा जानने में न आने वाली) शरीरि के ये देह नाशवान् कहे गये हैं। इसलिये हे भारत! तुम युद्ध (कर्तव्य का पालन) करो।

।।२-१९।। जो तुम स्वयं को मारने वाला मानते हो या शरीरी को मरा मानते हो, तो यह तुम्हारी बुद्धि का अज्ञान है। क्योंकि यह आत्मा न तो मरती है न ही मारी जाती है।

।।२-२०।। यह शरीरी न किसी काल में जन्म लेता है, न मरता है, और न ही शरीर के विकार के समान इस में विकार है। इसकी न तो उत्त्पति है और न ही अन्त। यह अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है।

।।२-२१।। हे पार्थ! जो पुरुष इस आत्मा को अविनाशी, नित्य, जन्मरहित और अव्यय स्वरूप जानता है। वह कैसे किसी को मारेगा और कैसे किसी को मरवायेगा?

।।२-२२।। जैसे मनुष्य को जीर्ण वस्त्रों के वियोग का शोक नहीं होता और वह नवीन वस्त्रों को धारण करता है। उसी प्रकार पुराने शरीरों का त्याग होना और दूसरे नवीन शरीरों का प्राप्त होना, मनुष्य के लिये शोक का कारण नहीं है।

।।२-२३।। शस्त्र इस (आत्मा) को काट नहीं सकते, अग्नि इसको जला नहीं सकती, जल इसको गिला नहीं कर सकती और वायु (इसको) सूखा नहीं सकती।

।।२-२४।। आत्मा के भाग नहीं हो सकते (अच्छेद्य), यह भस्म नहीं हो सकती (अदाह्य), यह गल नहीं सकती (अक्लेद्य) और यह सूखती भी नहीं (अशोष्य)। क्योंकि कि यह नित्य रहने वाला, सर्वगत (सबमें परिपूर्ण), अचल, अपरिवर्तनीय, सनातन (अनादि) है।

।।२-२५।। यह आत्मा अव्यक्त (प्रत्यक्ष नहीं दीखता), अचिन्त्य (यह चिन्तन का विषय नहीं है) और अविकारी (निर्विकार) कही जाती है। अतः इस आत्मा को इस प्रकार जान कर तुम को शोक करना उचित नहीं है।

।।२-२६।। हे महाबाहो! यदि तुम केवल शरीर का अस्तित्व ही मानते हो, तो भी यह शरीर नित्य पैदा होने वाला एवं नित्य मरने वाला है। इसलिये तुम्हारा अनित्य के लिये इस प्रकार शोक करना उचित नहीं है।

।।२-२७।। क्योंकि जन्म लेने वाले की मृत्यु निश्चित है, और मरने वाले का जन्म निश्चित है। इसलिए जन्म-मरण रूपी परिवर्तन के प्रवाह का निवारण नहीं हो सकता। अतः इस विषय (जन्म-मरण) के लिये तुम को शोक नहीं करना चाहिये।

।।२-२८।। हे भारत! समस्त प्राणी जन्म से पूर्व अव्यक्त थे, और मृत्यु के बाद अव्यक्त हो जायँगे। केवल बीच में ही व्यक्त हैं। अतः इसमें शोक करने की बात ही क्या है?

।।२-२९।। कोई इस परमात्मतत्व को आश्चर्य से देखता है; कोई आश्चर्य से वर्णन करता है; तथा अन्य कोई आश्चर्य से श्रवण करता है। परन्तु फिर भी कोई इसको जान नहीं पाता, कारण कि यह परमात्मतत्व दुर्विज्ञेय है।

।।२-३०।। हे भारत! यह देही सबके शरीर में नित्य ही अवध्य है, इसलिये समस्त प्राणियों के लिये तुम को शोक करना उचित नहीं है।

श्लोक ३१ से श्लोक ३८ - लोक संग्रह और स्वधर्म (कर्तव्य) पालन हेतु युद्ध करने की आवश्यकता

।।२-३१।। अपने स्वधर्म पालन हेतु, तुम्हारे लिये अपने कर्तव्य-कर्म से विचलित होना उचित नहीं है। क्योंकि धर्मयुक्त युद्ध से बढ़कर कोई दूसरा कल्याण कारक कर्त्तव्य, क्षत्रिय के लिये नहीं है।

।।२-३२।। हे पार्थ! अपने-आप प्राप्त हुआ युद्ध, स्वर्ग के लिए खुले हुए द्वार के समान है। वे क्षत्रिय बड़े भाग्यशाली हैं, जिनको ऐसा युद्ध प्राप्त होता है।

।।२-३३।। और यदि तुम इस धर्ममय युद्ध को स्वीकार नहीं करोगे, तो अपने स्वधर्म और कीर्ति का त्याग करके पाप को प्राप्त होंगे।

।।२-३४।। और समाज भी बहुत काल तक तुम्हारी अपकीर्ति का कथन कहते रहेंगे। वह अपकीर्ति सम्मानित मनुष्य के लिये मृत्यु से भी बढ़कर दुःखदायी होती है।

।।२-३५।। जो तुमको महारथी होने के कारण सम्मान करते है, वह तुमको भय के कारण युद्ध से निवृत्त हुआ जानेगे और तुम को तुच्छता के भाव से देखेगे।

।।२-३६।। तुम्हारे शत्रु तुम्हारे सार्मथ्य की निन्दा करते हुए, बहुत से अकथनीय वचनों को कहेंगे। तब उससे अधिक दु:ख की बात क्या होगी?

।।२-३७।। या तो युद्ध में मरकर तुम स्वर्ग को प्राप्त करोगे, या युद्ध जीतकर पृथ्वी का सुःख भोगोगे। अतः हे कौन्तेय! युद्ध का निश्चय कर तुम खड़े हो जाओ।

।।२-३८।। जय-पराजय, लाभ-हानि का विचार त्याग दो। और सुख-दुःख में सम भाव करके युद्ध के लिये तैयार हो जाओ। क्योंकि इस प्रकार युद्ध करने से तुम पाप को प्राप्त नहीं होंगे।

श्लोक ३९ से श्लोक ५३ - कामना का त्याग और समता प्राप्ति (योग) के लिये साधना से परमानन्द की प्राप्ति।

।।२-३९।। हे पार्थ! इस प्रकार मैंने तुम्हे अब तक सांख्य विषयक ज्ञान प्रदान किया है। अब तुम बुद्धियोग के विषय में सुनों। बुद्धियोग से युक्त होकर तुम्हारे कर्म, बन्धन से मुक्त हो जाएगे।

।।२-४०।। समता प्राप्ति का प्रयास व्यर्थ नहीं जाता, और इस प्रयास का विपरीत परिणाम नहीं होता। इस धर्म पूर्ण कार्य का अल्प प्रयास महान् भय से रक्षा कर लेता है।

।।२-४१।। हे कुरुनन्दन! समता को धारण करने के विषय पर तुम व्यवसायात्मिका (एक निश्चयात्मक) बुद्धि करो। अन्यथा, मनुष्य की अव्यवसायी बुद्धि में अनन्त कामनायेँ होती हैं और उन कामनाओं की अनेक शाखाएँ होती हैं।

।।२-४२-४३।। हे पार्थ! अल्पबुद्धि-अविवेकी अपनी शोभित वाणी से वर्णन करते है की वेदों में वर्णित यज्ञ विधियों का उद्देश्य, संसारिक विषयों को प्राप्त करना है। ऐसे कामना में तन्मय, जीवन भर उत्तम कर्मफल, भोग, ऐश्वर्य, और स्वर्ग प्राप्ति के लिये अनेक और विविध प्रकार के कार्य करते है।

।।२-४४।। भोग और एश्र्वर्य‌ में आसक्त होकर जिसकी बुद्धि हर ली गयी है, वह व्यवसायात्मिका (निश्चित) बुद्धि में स्थित नहीं हो सकता।

।।२-४५।। हे अर्जुन! वेदों में जो तीन गुणों का वर्णन मिलता है, उस त्रिगुण को तुम अपने आधीन करो। सत-असत के मध्य हो रहे द्वन्द्वों से रहित हो, सत में स्थिर हो जाओं। तुम योगक्षेम का विचार त्याग कर केवल समता को अन्तःकरण में धारण करने के लिये कार्य करो।

।।२-४६।। जिस प्रकार महान् जलाशय के प्राप्त होने पर मनुष्य का छोटे जलाशय में कुछ भी प्रयोजन नहीं रहता। उसी प्रकार वेद ज्ञाता को परमानन्द (ब्रह्मा) की प्राप्ति होने पर संसारिक भोगों से कुछ भी प्रयोजन नहीं रहता।

।।२-४७।। कर्तव्य-कर्म करने में ही तेरा अधिकार है, कर्मफल में कभी नहीं। तुम कर्मफल के हेतु मत बनो और तुम्हारी कर्म न करने में भी आसक्ति न हो।

।।२-४८।। हे धनंजय! योग में स्थित होने के लिये तुम कार्यों से सम्बन्ध का त्याग करके, कार्यों को करो। तथा कर्मफल की सिद्धि – असिद्धि में समभाव रहो। कारण की समत्व को प्राप्त करना ही योग कहलाता है।

।।२-४९।। इस बुद्धियोग (समता) की अपेक्षा सकाम कर्म अत्यन्त निकृष्ट हैं। हे धनंजय! तुम बुद्धि (तत्व ज्ञान) का आश्रय लो। क्योंकि फल के हेतु बनने वाले अत्यन्त दयनीय हैं।

।।२-५०।। बुद्धि युक्त मनुष्य पाप और पुण्य दोनों प्रकार के कर्मों से मुक्त हो जाता है। इसलिये तुम योग से युक्त हो जाओ। क्योंकि योग युक्त हो कर कर्तव्य करना ही कुशल कार्य है।

।।२-५१।। जब बुद्धियुक्त साधक विचारपूर्वक कर्मों में अहंता एवं प्राप्त फल का त्याग करता है। तब उसका जन्म पाप-पुण्य के बन्धन से मुक्त हो जाता है और वह निर्विकार को प्राप्त होता है।

।।२-५२।। जब तुम्हारी बुद्धि मोहरूपी दलदल को भली भाँति तर जायगी, उसी समय तुम सुने हुए और सुनने में आने वाले भोगों से वैराग्य को प्राप्त हो जाओंगे।

।।२-५३।। जिस काल में अनेक प्रकार के शास्त्रीय मतभेदों से विचलित हुई तुम्हारी बुद्धि समता में अचल और स्थित हो जायेगी, तब तुम (स्थिर बुद्धि) योग को प्राप्त हो जाओगे।

श्लोक ५४ से श्लोक ५८ - स्थिरबुद्धि एवं प्रज्ञा (विवेकजनित बुद्धि) प्रतिष्ठित साधक के लक्षण।

।।२-५४।। अर्जुन ने कहा: हे केशव! समता में स्थित स्थिर बुद्धिवाले साधक के क्या लक्षण होते हैं? वह स्थिर बुद्धिवाला साधक कैसे बोलता है, कैसे बैठता है, और कैसे चलता है? अर्थात व्यवहार करता है?

।।२-५५।। श्री भगवान् ने कहा: हे पार्थ! जिस काल में साधक मन में आयी सम्पूर्ण कामनाओं का भलीभाँति त्याग कर देता है। समता में स्थित, और शरीर से सन्तुष्ट रहता है। उस काल में वह स्थिरबुद्धि कहा जाता है।

।।२-५६।। मुनि, – दुःखों की प्राप्ति होने पर उद्विग्न नहीं होता। सुखों की प्राप्ति होने पर उसके मन में स्पृहा नहीं होती। राग, भय और क्रोध से वह सर्वथा रहित होता है। ऐसे योग स्थित मुनि का मन धीर (शान्त) रहता है।

।।२-५७।। जो साधक सर्वत्र संसार के स्नेह (ममता) से रहित है, वह सब प्रकार के शुभ-अशुभ पदार्थ, प्राणी, परिस्थिति को प्राप्त होने पर, न तो उसका अभिनन्दन करता है, और न ही उसकी उपेक्षा करता है, वह प्रज्ञा (विवेकजनित योगी) प्रतिष्ठित है।

।।२-५८।। जिस तरह कछुआ अपने अङ्गों को सब ओर से समेट लेता है, उसी प्रकार इन्द्रियों के विषय की प्राप्ति होने पर, जिसका अन्तःकरण संयमित रहता है, वह प्रज्ञावान (विवेकजनित) योग में स्थित है।

श्लोक ५९ से श्लोक ६८ - इन्द्रियों के विषय में राग (रस) की प्रबलता का वर्णन; उसके निवारण का उपाय।

।।२-५९।। देह में आसक्त, यद्यपि इन्द्रियों को उनके अपने विषय से अलग कर ले, तो भी उसका भोग रस समाप्त नहीं होता। परन्तु जिसने परम तत्व (समता) का अनुभव किया है, उसका भोग रस समाप्त हो जाता है।

।।२-६०।। हे कौन्तेय! भोग रस होने के कारण यत्न करते हुये भी विद्वान् मनुष्य के मन को प्रमथन इन्द्रियाँ बलपूर्वक हर लेती है।

।।२-६१।। सभी इन्द्रियों के विषय में स्थित राग-द्वेष की निवृति के लिये साधक चित को मेरा परायण (ध्यान योग) करके बैठे। क्योंकि जिसका अन्तःकरण संयमित है, राग-द्वेष से रहित है, उसकी विवेकजनित बुद्धि प्रतिष्ठित है।

।।२-६२-६३।। योग – विषयों का चिन्तन करने वाले मनुष्य की उन विषयों में आसक्ति पैदा हो जाती है। आसक्ति से कामना पैदा होती है। कामना से क्रोध पैदा होता है। क्रोध होनेपर सम्मोह (अविवेक) उत्पन्न हो जाता है। सम्मोह से स्मृति का विभ्रम होता है। स्मृति विभ्रम होनेपर बुद्धिका नाश हो जाता है। बुद्धिका नाश होनेपर मनुष्यता नष्ट हो जाती है।

।।२-६४-६५।। जो राग-द्वेष से रहित है, वह इन्द्रियों के द्वारा विषयों का सेवन करता है, परन्तु उसका अन्तःकरण संयमित रहता है। इस प्रकार जिसका अन्तःकरण संयमित है, वह निर्मलता को प्राप्त हो जाता है। और जिसका अन्तःकरण निर्मल है, उसके सम्पूर्ण दुःखों का नाश हो जाता है। तब प्रसन्नचित साधक की बुद्धि, आकाश की भाँति समता में स्थित हो जाती है।

।।२-६६।। जिसमें समता में स्थित होने की भावना (दृढ़ बुद्धि) नहीं होती, उसका अन्तःकरण समता में स्थित नहीं हो सकता। और जिसका अन्तःकरण समता में स्थिर नहीं है, उसको शान्ति प्राप्त नहीं हो सकती। और जो शान्ति रहित है, वह सुखी कैसे हो सकता है?

।।२-६७।। जिस प्रकार जल में विचरण करने वाली नाव को, वायु का एक तीव्र वेग, अपने पथ से पृथक कर देता है। उसी प्रकार जब इन्द्रियाँ अपने-अपने विषय में विचरण करती है, और मन किसी एक विषय पर आसक्त हो जाता है, तब वह विषय ही मनुष्य की प्रज्ञा का हरण कर लेता है।

।।२-६८।। इस प्रकार हे महाबाहो! शरीरक एवं मानसिक कार्य करते हुए जिस साधक का अन्तःकरण इन्द्रियों के अपने-अपने विषय के राग से रहित है, वह प्रज्ञावान (विवेकजनित बुद्धि) प्रतिष्ठित है।

श्लोक ६९ से श्लोक ७२ - योगी के लक्षण।

।।२-६९।। अन्तःकरण में स्थित समता के अनुभव से जो मनुष्य अज्ञान है, उसके लिये वह अज्ञान रात्री (अंधकार) के समान है। परन्तु संयमी मनुष्य समता में स्थित होने के लिये योग में प्रवृत्त रहता (जागता) है। सधारण प्राणी भोग और संग्रह के लिये कार्य करता (जागता) है। परन्तु मुनि की दृष्टि में यह व्यर्थ (रात) के सामान है।

।।२-७०।। जिस प्रकार जल से परिपूर्ण अचल प्रतिष्ठा वाले समुद्र में अनेक नदियों का जल उसे विचलित किये बिना समा जाता हैं। वैसे ही संयमी मनुष्य के अन्तःकरण में प्राप्त पदार्थ-परिस्थिति विकार उत्पन्न नहीं करते और योगी परमशान्ति को प्राप्त होता है। भोगों की कामनावाला नहीं।

।।२-७१।।जो योगी सम्पूर्ण कामनाओं और भोगों का त्याग करके अपने कर्तव्यों का पालन करता है, जो स्पृहारहित, ममतारहित और अहंकाररहित है, वह शान्ति को प्राप्त होता है।

।।२-७२।। हे पार्थ! यह योग (ब्राह्मी) स्थिति है। इसे प्राप्त कर पुरुष मृत्यु को लेकर मोहित नहीं होता अर्थात् मोह को प्राप्त नहीं होता। यह स्थिति यदि अन्तकाल में भी स्थित हो जाय, तो मनुष्य शान्त भाव से निर्वाण (भय रहित मृत्यु) को प्राप्त होता है।

धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष

धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ है। यह चार पुरुषार्थ को करना ही मनुष्य जीवन का उदेश्य है। उद्देश्य इसलिये है क्योंकि इन चार पुरुषार्थ को करने से ही मनुष्य का कल्याण है। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, का अर्थ क्या है? यह पुरुषार्थ करने से मनुष्य का कल्याण किस प्रकार है? धर्म धर्म का अर्थ है कर्तव्य। श्रीमद […]

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