भावार्थ:
भगवान श्री कृष्ण विश्वास देते है की प्रभव तथा प्रलय का मूल कारण केवल परमात्मतत्व ही है, अन्य कोई दूसरा किञ्चिन्मात्र भी कारण नहीं है।अर्थात् मूल कारण का कोई उत्पादक नहीं है।
यह ऊर्जा स्रोत, शक्ति रूपी परमात्मतत्व समस्त प्रकृति में समान रूप से व्याप्त है परन्तु दिखती नहीं। इस संसार अर्थात् देश, काल, व्यक्ति, वस्तु, घटना, परिस्थिति आदि, सभी की सत्ता दिखती है। परन्तु इन सभी परिवर्तनशील हैं तथा जिसकी सत्तासे ये सभी ‘है’ दीखते हैं, वह परमात्मा ही इन सबमें परिपूर्ण हैं। परन्तु जिसके होने पन से इन सब का होनापन दीखता है अर्थात् जिसकी सत्ता से ये सभी दीखते हैं, वह परमात्मतत्व ही इन सबमें परिपूर्ण हैं।
जिस प्रकार एक ही सूत्र सभी मणियों को पिरोये रहता है परन्तु वह सूत्र हमें दृष्टिगोचर नहीं होता, उसी प्रकार परमात्मतत्व सभी प्राणीओं में व्याप्त होता है। इसका दूसरा दृष्टान्त वस्त्र से लिया है जिसमें सूत तो दीखता है परन्तु सूत का दीर्घ तन्तु नहीं दीखता। ऐसे ही संसार में जितने प्राणी हैं, वे सभी नाम, रूप, आकृति आदिसे अलग-अलग दीखते हैं, पर वास्तवमें उनमें व्याप्त रहनेवाला परमात्मतत्व एक ही है।
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ है। यह चार पुरुषार्थ को करना ही मनुष्य जीवन का उदेश्य है। उद्देश्य इसलिये है क्योंकि इन चार पुरुषार्थ को करने से ही मनुष्य का कल्याण है। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, का अर्थ क्या है? यह पुरुषार्थ करने से मनुष्य का कल्याण किस प्रकार है? धर्म धर्म का अर्थ है कर्तव्य। श्रीमद […]
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