भावार्थ:
मनुष्य के समस्त कार्य सात्त्विक, राजस और तामस गुणों के प्रभाव में होते है। मनुष्य में स्थित इन गुणों का कारण परमात्मतत्व है। परन्तु भगवान श्री कृष्ण यहाँ स्पष्ट करते है की सात्त्विक, राजस और तामस – यह तीनों गुण के उत्पन्न होने का कारण तो परमात्मतत्व है परन्तु यह गुण परमात्मतत्व के कार्य नहीं है, यह परमात्मतत्व के आधीन नहीं है।
अध्याय ७ श्लोक ८ से अध्याय ७ श्लोक १२ तक सृष्टि का कारण परमात्मतत्व है ऐसा कहा गया है, और मनुष्य जब इस पर विचार करता है तो वह परमात्मतत्व को इन सबका का कार्य मान लेता है।
‘न त्वहं तेषु ते मयि’: – तथापि न मैं उनमें हूँ और न वह मेरे अधीन है। तात्पर्य है कि गुणों का प्रभाव तो मनुष्य पर है परन्तु यह गुण परमात्मतत्व के अधीन हो कर; या परमात्मतत्व की आज्ञा से प्रभाव नहीं डालते। ना ही परमात्मतत्व मनुष्य शरीर में रह कर गुण रूप से कार्य करता है। कारण की परमात्मतत्व में किसी प्रकार की क्रिया नहीं होती।
प्रकृति में जितनी भी क्रिया होती है उन सब के पीछे कारण होता और उस कारण पर शौध करने पर कारण में क्रिया दिखती है और पुनः उस क्रिया का कारण दीखता है। इस प्रकार शौध करते-करते जो मूल, सुक्षम से भी सुक्षम तत्व है, जिसको प्रकृति पदार्थ से जाना नहीं जा सकता, वह परमात्मतत्व कारण रूप तो है पर उसके क्रिया नहीं है, क्योकि तत्व का अंत है, जिसके आगे कोई तत्व नहीं है।
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ है। यह चार पुरुषार्थ को करना ही मनुष्य जीवन का उदेश्य है। उद्देश्य इसलिये है क्योंकि इन चार पुरुषार्थ को करने से ही मनुष्य का कल्याण है। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, का अर्थ क्या है? यह पुरुषार्थ करने से मनुष्य का कल्याण किस प्रकार है? धर्म धर्म का अर्थ है कर्तव्य। श्रीमद […]
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