भावार्थ:
कामना पूर्ति के लिये जो देवताओं की शरण जाते है, उनको फल तो मिलता है, परन्तु वह अन्तवाला (नाशवान्) फल होता है। फल नाशवान होने के कारण अन्तः करण में सुख-दुःख बना रहता है। कामना पूर्ति होने पर और अधिक कामना उत्पन्न होती है, और मनुष्य सुख-दुःख के बन्धन में बँधा रहेता है।
इस प्रकार के मनुष्यों को इस श्लोक में अल्प बुद्धि वाला कहा गया है। मनुष्य में अहंता बहुत बड़ी वृति है। इसलिये अहंता का त्याग करके भक्ति करना बहुत बड़ी साधना है। इसलिये ऐसे भक्त को अध्याय ७ श्लोक १८ में उदार मन वाला कहा गया है। यह अल्प बुद्धि ही है, जो मनुष्य देवता की भक्ति नाशवान् फल की प्राप्ति के लिये करता जो सुख-दुःख देने वाले है।
इस के विपरीत जब मनुष्य परमात्मा की भक्ति करता है, तब उसको परम् आंनद की प्राप्ति होती है। इसलिये परमात्मा की भक्ति करने वाले को अध्याय ७ श्लोक १८ में ज्ञानी भक्त कहा है।
यहाँ देवता की भक्ति से तात्पर्य उस भक्ति से है जो कामना पूर्ति के लिये की जाती है। और जब भक्ति समता प्राप्ति के लिये है तब वह परमात्मा की भक्ति है।
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ है। यह चार पुरुषार्थ को करना ही मनुष्य जीवन का उदेश्य है। उद्देश्य इसलिये है क्योंकि इन चार पुरुषार्थ को करने से ही मनुष्य का कल्याण है। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, का अर्थ क्या है? यह पुरुषार्थ करने से मनुष्य का कल्याण किस प्रकार है? धर्म धर्म का अर्थ है कर्तव्य। श्रीमद […]
Read More