भावार्थ:
अध्याय १ श्लोक ४१ – अर्जुन ने कहा:
जब कुलमें अधर्म बढ़ जाता है तब आचरण अशुद्ध होने लगते हैं और बुद्धि तामसी बन जाती है। बुद्धि तामसी होनेसे मनुष्य अकर्तव्य और कर्तव्य में भेद करने में अस्मर्थ हो जाता है। इस विपरीत बुद्धिसे कुलकी स्त्रियाँ दूषित अर्थात् व्यभिचारिणी हो जाती हैं। स्त्रियोंके दूषित होनेपर जो संतान पैदा होती है वह अधर्मी हो जाती है। अतः उनके जन्म संस्कार ही अधर्म का पालन करने वाले होजाते है। इस को ही यहा वर्णसंकर कहा गया है।
श्लोक के सन्दर्भ मे:
पुरुष और स्त्री दोनों अलगअलग वर्णके होनेपर उनसे जो संतान पैदा होती है वह भी वर्णसंकर कहलाती है। कारण की पुरुष और स्त्री अलग-अलग कुल के होने के कारण उनके धर्म भी अलग होते है। उनसे उत्तपन्न सन्तान किसी एक कुल मर्यादा का पालन करने में असमर्थ होते है।
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ है। यह चार पुरुषार्थ को करना ही मनुष्य जीवन का उदेश्य है। उद्देश्य इसलिये है क्योंकि इन चार पुरुषार्थ को करने से ही मनुष्य का कल्याण है। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, का अर्थ क्या है? यह पुरुषार्थ करने से मनुष्य का कल्याण किस प्रकार है? धर्म धर्म का अर्थ है कर्तव्य। श्रीमद […]
Read MoreTo give feedback write to info@standupbharat.in
Copyright © standupbharat 2024 | Copyright © Bhagavad Geeta – Jan Kalyan Stotr 2024