भावार्थ:
दृढ़ निश्चय से, जिसने पूर्व श्लोक में वर्णित राग-द्वेष रूपी द्वन्द्व का त्याग कर दिया है। जिस साधक के समस्त कार्य केवल प्रकृति-समाज कल्याण के लिये होते है, वह पुण्यकर्मा है। जो साधक प्राप्त प्रकृति पदार्थों को निर्वाह मात्र के लिये ही उपयोग करता है और अन्य को प्रकृति-समाज कल्याण के लिये अर्पण करता है और जिसमें अहंता का त्याग हो गया है उसके सभी पाप नष्ट हो जाते है।
इस प्रकार का कार्य (भजन) करने से साधक को परमात्मतत्व की अनुभूति होती है।
‘पाप’ पद पाप और पुण्य दोनों का वाचक है।
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ है। यह चार पुरुषार्थ को करना ही मनुष्य जीवन का उदेश्य है। उद्देश्य इसलिये है क्योंकि इन चार पुरुषार्थ को करने से ही मनुष्य का कल्याण है। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, का अर्थ क्या है? यह पुरुषार्थ करने से मनुष्य का कल्याण किस प्रकार है? धर्म धर्म का अर्थ है कर्तव्य। श्रीमद […]
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