भावार्थ:
जो कार्य स्वयं (कामना पूर्ति) के लिये किये जाते है, अथवा जो कर्तव्य स्वयं के मान-सम्मान अथवा दम्भ (दिखावटीपन) के लिये किये जाते है, वह राजस कार्य है।
लोग हमें भीतरसे सद्गुणी, सदाचारी, संयमी, तपस्वी, दानी, धर्मात्मा, आदि समझें, जिससे संसार में हमारी प्रसिद्धि हो जाय। ऐसे दिखावटीपने को लेकर जो यज्ञ किया जाता है? वह राजस कहलाता है। यज्ञ में अध्याय १६ श्लोक १५ एवं अध्याय १६ श्लोक १७ में वर्णित सभी विशेषता आ जाती है।
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ है। यह चार पुरुषार्थ को करना ही मनुष्य जीवन का उदेश्य है। उद्देश्य इसलिये है क्योंकि इन चार पुरुषार्थ को करने से ही मनुष्य का कल्याण है। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, का अर्थ क्या है? यह पुरुषार्थ करने से मनुष्य का कल्याण किस प्रकार है? धर्म धर्म का अर्थ है कर्तव्य। श्रीमद […]
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