भावार्थ:
कर्त्ता, कार्य, कारण, और उपकरण, सभी ब्रह्म तत्व है, ऐसा भाव इन तीन शब्दों से निर्देशित होता है – ‘ऊँ, तत् सत्’।
वैदिक सिद्धान्तों को मानने वाला साधक शास्त्र विधि से नियत यज्ञ, दान और तपरूप क्रियाएँ सदा ‘ऊँ तत् सत्’ के उच्चारण के साथ करता हैं। ऐसा करने से साधक का सम्बन्ध कर्त्ता (शरीर), कार्य, कारण, और उपकरण, से नहीं रहता। सम्बन्ध न होने से कार्य और उसके फल बाँधने वाले नहीं रहते।
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ है। यह चार पुरुषार्थ को करना ही मनुष्य जीवन का उदेश्य है। उद्देश्य इसलिये है क्योंकि इन चार पुरुषार्थ को करने से ही मनुष्य का कल्याण है। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, का अर्थ क्या है? यह पुरुषार्थ करने से मनुष्य का कल्याण किस प्रकार है? धर्म धर्म का अर्थ है कर्तव्य। श्रीमद […]
Read More