भावार्थ:
सत् पद से भाव क्या है, उसका वर्णन इस श्लोक में हुआ है।
दृश्यमान सृष्टि के रूप परमत्मा हैं इस प्रकार परमात्मा की सत्ता (होनेपन) का नाम सद्भाव है। सृष्टि में होने वाली क्रिया भी सद्भाव के अन्तर्गत हैं। मनुष्य के अन्तःकरण में स्थित जितने भी श्रेष्ठ, एवं उत्तम भाव हैं, वे सब के सब साधुभाव के अन्तर्गत हैं। मनुष्य के कर्तव्य रूपी कर्म, श्रेष्ठ आचरण आदि प्रशस्ते कर्मणि के अन्तर्गत हैं।
इस प्रकार सृष्टि, सृष्टि में होने वाली क्रिया, मनुष्य के साधुभाव एवं शुभ और श्रेष्ठ कर्म, के होने परमात्मा कारण है। ऐसा भाव सत् पद से इंगित होता है।
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ है। यह चार पुरुषार्थ को करना ही मनुष्य जीवन का उदेश्य है। उद्देश्य इसलिये है क्योंकि इन चार पुरुषार्थ को करने से ही मनुष्य का कल्याण है। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, का अर्थ क्या है? यह पुरुषार्थ करने से मनुष्य का कल्याण किस प्रकार है? धर्म धर्म का अर्थ है कर्तव्य। श्रीमद […]
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