भावार्थ:
आसक्ति रहित का अर्थ है, सम्बन्ध से रहित। मनुष्य सांसारिक पदार्थ, शरीर और कार्यों से अपना सम्बन्ध मानता है। सम्बन्ध को मानना ही आसक्ति है, और सम्बन्ध का त्याग करना आसक्ति रहित होना है।
योग युक्त्त साधक को अनुभव होता है कि शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, द्वारा होने वाली क्रियाओं का कारण शरीर की प्रकृति है, उसकी मानी हुई अहंता नहीं। शरीर के साथ सम्बन्ध (आसक्ति) मानना ही अहंता का एक मात्र कारण है। और जब कार्य इस माने हुये शरीर के लिये किये जायेगे, संसार से सम्बन्ध माना जाये, तब यह आसक्ति और अधिक बढ़ जाती है।
अतः योग युक्त साधक शरीर और संसारिक पदार्थों की आसक्ति का त्याग कर के, सभी कार्य परमात्मा के लिये करता है स्वयं के लिये नहीं। परमात्मा के लिये कार्यों को करने का अर्थ है कि सभी कार्य संसार की सेवा के लिये किये जाते है। यह ही कार्यों को परमात्मा के अर्पण करना है।
अतः योग युक्त्त साधक आसक्ति (शरीर, संसार) का त्याग करके सभी कार्य संसार की सेवा के लिये करता है और सभी कार्यो का श्रय (हेतु) परमात्मा को मानता है।
इस प्रकार, संसार के सभी कार्यों को करता हुआ भी साधक कार्यों से लिप्त नहीं होता और पाप को प्राप्त नहीं होता। कारण की पाप का हेतु कार्य से सम्बन्ध है कार्य का होना नहीं।
जिस प्रकार कमल कीचड़ में रहकर भी कीचड़ से लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार योग युक्त्त साधक संसार में रहता हुआ और संसार के सभी कार्यों को करता हुआ भी संसार और संसार के कार्यों से लिप्त नहीं होता।
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