भावार्थ:
जिस कालमें साधक सम्पूर्ण प्राणियोंके अलगअलग भावोंको, प्राणियों की पृथक्ता को, इस प्रकार प्रत्यक्षभावसे देखता है कि यह सब कुछ परमात्मतत्व ही है। तथा परमात्मतत्व से ही सबकी उत्पत्ति, विकास, संकल्प, क्रिया और लीन होना, इत्यादि सभी प्रकार से सारा विस्तार हुआ देखने लगता है, तब उस समय वह ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है, अर्थात ब्रह्मरूप ही हो जाता है।
अतः पूर्व श्लोक मे स्वयं के क्रिया का कारण परमात्मतत्व है ऐसा कहा और इस श्लोक मे सभी प्राणियों में हो रही क्रिया का कारण परमात्मतत्व है।
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ है। यह चार पुरुषार्थ को करना ही मनुष्य जीवन का उदेश्य है। उद्देश्य इसलिये है क्योंकि इन चार पुरुषार्थ को करने से ही मनुष्य का कल्याण है। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, का अर्थ क्या है? यह पुरुषार्थ करने से मनुष्य का कल्याण किस प्रकार है? धर्म धर्म का अर्थ है कर्तव्य। श्रीमद […]
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