भावार्थ:
परमात्मतत्व अव्यक्त है, परन्तु उनकी विशेषता का वर्णन पूर्व में भी श्रीमद भागवत गीता हुआ है, उसको ही यहां पूर्णः वर्णन किया है।
पूर्व श्लोक में जिस परमात्मतत्व को सम्पूर्ण संसार में हो रहे कार्य का कारण कहा अथवा प्राणीओं के उत्पति और नाश का कारण कहा है, वह अनादि, निर्गुण और अव्यय है।अर्थात प्राणी-पदार्थ में तो गुण दिखते है परन्तु उनके होने का कारण परमात्मतत्व निर्गुण है। प्राणीओं की उत्पति और नाश होता है परन्तु उनमे स्थित परमात्मतत्व अव्यय (नाश रहित) है।
यह परमात्मतत्व विलक्षणता ही है कि वह शरीर में स्थित हुआ कार्यों का कारण होते हुए भी न कार्य करता है और न फल से लिप्त होता है।
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ है। यह चार पुरुषार्थ को करना ही मनुष्य जीवन का उदेश्य है। उद्देश्य इसलिये है क्योंकि इन चार पुरुषार्थ को करने से ही मनुष्य का कल्याण है। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, का अर्थ क्या है? यह पुरुषार्थ करने से मनुष्य का कल्याण किस प्रकार है? धर्म धर्म का अर्थ है कर्तव्य। श्रीमद […]
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