भावार्थ:
पूर्व श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण कहते है कि क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ को सही प्रकार से जानना, ही वास्तविक ज्ञान है। इसलिये क्षेत्र के और क्षेत्रज्ञ के जिन विषयों पर मैं तुमसे संक्षेप में कहूँगा, उसको आगे के श्लोकों में सुनो। वह विषय इस प्रकार है –
क्षेत्र का स्वरूप किस प्रकार का है – अध्याय १३ श्लोक ५
क्षेत्र की प्रकृति (गुण) क्या है – अध्याय १३ श्लोक ६ से अध्याय १३ श्लोक १० तक
क्षेत्र के दुवारा जो कार्य होते है, उसका कारण क्या है- अध्याय १३ श्लोक १९ से अध्याय १३ श्लोक २२ तक
क्षेत्रज्ञ क्या है – अध्याय १३ श्लोक ३१ से अध्याय १३ श्लोक ३३
और क्षेत्रज्ञ किस प्रभाव वाला है – अध्याय १३ श्लोक १३ से अध्याय १३ श्लोक १७
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ है। यह चार पुरुषार्थ को करना ही मनुष्य जीवन का उदेश्य है। उद्देश्य इसलिये है क्योंकि इन चार पुरुषार्थ को करने से ही मनुष्य का कल्याण है। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, का अर्थ क्या है? यह पुरुषार्थ करने से मनुष्य का कल्याण किस प्रकार है? धर्म धर्म का अर्थ है कर्तव्य। श्रीमद […]
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