भावार्थ:
इस श्लोक के दो भाग है।
प्रथम भाग में उस पुरुष का वर्णन हुआ है जो अन्य पुरुष से उत्तम पुरुष है और जिसको परमात्मा नाम से भी जाना जाता है। वह उत्तम पुरुष कौन है, उसके क्या गुण है, इसका वर्णन अगले श्लोक (अध्याय १५ श्लोक १८) में हुआ है।
दूसरे भाग में “ईश्वर” पद से परमात्मतत्व का वर्णन हुआ है।
क्युकी तीनों लोको में पदार्थ-प्राणी के भरण-पोषण (होने वाली क्रिया) का कारण परमात्मतत्व है, इसलिये उनकों अविनाशी ईश्वर कहा है। अर्थात् ईश्वर (परमात्मतत्व) तीनों लोकों में समान रूप से नित्य व्याप्त है और तीनों लोक के होने का कारण है।
सृष्टि में सभी कुछ (पदार्थ-प्राणी और उनके दुवारा होने वाली क्रिया) इतनी व्यवस्थित है, की ऐसा जान पड़ता है की कोई शक्ति सृष्टि को व्यवस्थित रूप से चला रही है। मनुष्य उस शक्ति को सकार और सगुण रूप में देखता है, और उस शक्ति को ईश्वर मानता है।
ईश्वर अर्थात सबको संचालित करने वाला।
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ है। यह चार पुरुषार्थ को करना ही मनुष्य जीवन का उदेश्य है। उद्देश्य इसलिये है क्योंकि इन चार पुरुषार्थ को करने से ही मनुष्य का कल्याण है। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, का अर्थ क्या है? यह पुरुषार्थ करने से मनुष्य का कल्याण किस प्रकार है? धर्म धर्म का अर्थ है कर्तव्य। श्रीमद […]
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