भावार्थ:
शरीर में मैं-मेरापन होने से ही मान,-आदरसत्कार की इच्छा होती है। शरीरसे अपना सम्बन्ध माननेके कारण ही मनुष्य शरीरके मानआदरको भूलसे स्वयंका मान-आदर मान लेता है और फँस जाता है। जिन भक्तोंका केवल भगवान्में ही अपनापन होता है, उनका शरीर में मैं-मेरापन नहीं रहता। अतः वे शरीरके मान-आदरसे प्रसन्न नहीं होते। एकमात्र भगवान्के शरण होनेपर उनका शरीरसे मोह नहीं रहता, फिर मान-आदरकी इच्छा उनमें हो ही कैसे सकती हैकेवल भगवान्का ही उद्देश्य, ध्येय होनेसे और केवल भगवान्के ही शरण, परायण रहनेसे वे भक्त संसारसे विमुख हो जाते हैं और परमानन्द को प्राप्त होते है।
केवल भगवान्के ही शरण रहने से भक्तों की अहंता समाप्त हो जाती है और उनकी स्थिति निरन्तर भगवान्में ही रहती है।
संसारका ध्येय, लक्ष्य रहनेसे ही संसार की वस्तु, परिस्थिति आदिकी कामना होती है। अर्थात् अमुक वस्तु, व्यक्ति आदि मुझे मिल जाय। परन्तु जिन भक्तोंका सांसारिक वस्तु आदिको प्राप्त करनेका उद्देश्य है ही नहीं, वे कामनाओं से सर्वथा रहित हो जाते हैं। शरीर में ममता होनेसे कामना पैदा हो जाती है कि मेरा शरीर स्वस्थ्य रहे, हृष्टपुष्ट रहे। शरीर आदि में ममता न रहनेसे भक्तोंकी कामनाएँ मिट जाती हैं। भक्तों का यह अनुभव होता है कि शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि और अहम् (मैंपन) — ये सभी भगवान्के ही हैं। भगवान्के सिवाय उनका अपना कुछ होता ही नहीं। ऐसे भक्तोंकी सम्पूर्ण कामनाएँ विशेष और निःशेषरूपसे नष्ट हो जाती हैं।
वे भक्त सुख-दुःख, रागद्वेष आदि द्वन्द्वोंसे रहित हो जाते हैं। कारण कि उनके सामने अनुकूलप्रतिकूल जो भी परिस्थिति आती है, उसको वे भगवान्का ही दिया हुआ प्रसाद मानते हैं। ऐसा भाव होनेसे उनके द्वन्द्व सुगमतापूर्वक मिट जाते हैं।
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ है। यह चार पुरुषार्थ को करना ही मनुष्य जीवन का उदेश्य है। उद्देश्य इसलिये है क्योंकि इन चार पुरुषार्थ को करने से ही मनुष्य का कल्याण है। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, का अर्थ क्या है? यह पुरुषार्थ करने से मनुष्य का कल्याण किस प्रकार है? धर्म धर्म का अर्थ है कर्तव्य। श्रीमद […]
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