श्रीमद भगवद गीता : ०८

शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः।

गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात् ।।१५-८।।

 

 

जैसे वायु गन्धके स्थानसे गन्धको ग्रहण करके ले जाती है, ऐसे ही इन्द्रियाँ-मन शरीरं (अन्तःकरण) को हर कर संसारिक विषयों में ले जाती है। ।।१५-८।।

 

भावार्थ:

अध्याय २ श्लोक ६० में इन्द्रियों के विषयों में आसक्ति रहने से इन्द्रियाँ मनको बलपूर्वक हर लेती है, ऐसा वर्णन हुआ है। पुनः अध्याय २ श्लोक ६६ में इन्द्रियों दुवारा मन और बुद्धि को हर लेने का वर्णन हुआ है। उसी प्रकार इस श्लोक में भी वायु और गन्ध का उद्धरण देते हुये इन्द्रियों दुवारा मन और बुद्धि को हर लेने का वर्णन हुआ है।

परमात्माने जीवात्मा को शरीरादि सामग्री का सदुपयोग करनेकी स्वाधीनता दी है। उनका सदुपयोग करके अपना उद्धार करनेके लिये ये वस्तुएँ दी हैं। परन्तु जीवसे यह बहुत बड़ी भूल होती है कि वह उस सामग्रीका सदुपयोग नहीं करता प्रत्युत अपनेको उनका स्वामी मान लेता है और वास्तवमें उनका दास बन जाता है। जीवात्मा शरारीदि जड पदार्थों का स्वामी (ईश्वर) बनकर अपने वास्तविक स्वामी परमात्माको भूल जाता है, उनसे विमुख हो जाता है।

 

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