भावार्थ:
भगवान श्रीकृष्ण कहते है कि अध्याय १३ से अध्याय १५ में मैने सम्पूर्ण भौतिक जगत का प्रकाशक और अधिष्ठान, समस्त प्राणियों के हृदय में स्थित, वेदों के द्वारा जानने योग्य यह गुह्यतम (अत्यन्त गूढ़) शास्त्र का वर्णन किया है।
इस शास्त्र में शरीर के विज्ञान, शरीर के द्वारा होने वाली क्रिया का कारण विज्ञान, परमात्मतत्व का ज्ञान संक्षिप्त में परन्तु पूर्णतया से दिया है। इस ज्ञान-विज्ञान को प्राप्त करके मनुष्य के कार्य और आचरण किस प्रकार के होने चाहिये इस का भी वर्णन किया है। योग सिद्धि की प्रक्रिया क्या है और किस प्रकार मनुष्य सिद्धि को प्राप्त कर पुरषों में उत्तम पुरष बन सकता है, इस सबका वर्णन किया है।
अपने पुरुषोत्तम स्वरूप को जानने वाला पुरुष बुद्धिमान् बन जाता है। कारण कि इस ज्ञान को प्राप्त करने के पश्चात् उसके लिये कुछ भी जानना शेष नहीं रहता क्योंकि उसने जानने योग्य पुरुषोत्तम किस प्रकार हो इसको जान लिया है।
इस ज्ञान के पश्चात् वह जीवन में वस्तुओं के यथार्थ स्वरूप को समझने में और कर्म से संबंधित निर्णय लेने में त्रुटि नहीं करता है। फलस्वरूप वह न स्वयं के लिये भ्रम और दुख उत्पन्न करता है और न ही समाज के अन्य व्यक्तियों के लिये।
परमात्मा के ज्ञान का फल है कृतकृत्यता। अन्तःकरण में पूर्ण सन्तोष का वह भाव, जो जीवन के लक्ष्य को प्राप्त कर लेने पर उदय होता है, कृतकृत्यता कहलाता है। तत्पश्चात् उस व्यक्ति के लिये अपने माने हुए शरीर के लिये न तो कोई प्राप्तव्य शेष रहता है और न ही कोई कार्य।
और तब वह केवल परमात्मा के लिये कार्य करता है। अर्थात संसार और समाज से प्राप्त कर्तव्यों को ही करता है।
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ है। यह चार पुरुषार्थ को करना ही मनुष्य जीवन का उदेश्य है। उद्देश्य इसलिये है क्योंकि इन चार पुरुषार्थ को करने से ही मनुष्य का कल्याण है। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, का अर्थ क्या है? यह पुरुषार्थ करने से मनुष्य का कल्याण किस प्रकार है? धर्म धर्म का अर्थ है कर्तव्य। श्रीमद […]
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