अर्जुन – संसार के आश्रय से रहित और ब्रह्मप्राप्ति न होने पर मनुष्य की स्थिति क्या होती है?
भावार्थ:
संसार से सम्बन्ध मानने के कारण, मनुष्य की संसार के विषयों में प्रियता रहती है। वह उन विषयों में सुख देखता है और उस सुख के लिये उन पर आश्रित रहता है। भोग के कारण मनुष्य का उन विषयों पर आश्रय इतना दृढ़ होता है की वह उस आश्रय का त्याग कर ही नहीं पाता। विचित्र बात यह है की मनुष्य का उन विषयों से वियोग निश्चित है और वियोग से दुःख होना भी निश्चित है, फिर भी वह उन विषयों की कामना करता है।
अतः जब मनुष्य योग आरूढ़ होता है, तब उसको संसार से सम्बन्ध विच्छेद करना होता है। इसके लिये सर्व प्रथम उसको प्राप्त विषयों में माने हुये सुख का त्याग करना होता है और दुःख को सहन करना पड़ता है। साथ ही उसको कामना पूर्ति के लिये किये जाने वाले कार्यों का त्याग करना पड़ता है।
सुख का त्याग, कामना का त्याग और कामना पूर्ति के लिये कार्य का त्याग करने पर मनुष्य को विशेष प्रकार का भय होता है। भय होता है, भोग के त्याग का। भय होता है, कामना पूर्ति के लिये कार्य करने पर प्राप्त फल के सुख से वंचित होने का।
योग साधना से ब्रह्म प्राप्ति, (परम् आनन्द, परम् सुख) की अनुभूति बाद में होती है, विषयों के भोग और सुख के वियोग की अनुभुति पहले होती है।
साथ ही मनुष्य को सुख-दुःख के चक्र में एक विशेष प्रकार का आनन्द आता है। अन्तःकरण में जब सुख-दुःख (विषमता) का भाव नहीं रहता, और समता रहती है, तब वह समता खाली पन के रूप में मनुष्य को व्यथित करती है।
इसी भय के कारण अर्जुन ने यह श्लोक कहा है। अर्जुन को भय होता है कि सांसारिक सुख-दुःख का त्याग कर दिया और ब्रह्म की प्राप्ति नहीं हुई तो मनुष्य संसार के सुख से भी गया और परम सुख भी नहीं मिला।
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