भावार्थ:
पूर्व श्लोक (अध्याय ६ श्लोक ४१) में वर्णित द्वितीय अवस्था का साधक जब मृत्यु को प्राप्त होता है, तब उसका क्या होता है, इस का वर्णन इस श्लोक में हुआ है।
द्वितीय अवस्था के साधक का ब्रह्म प्राप्ति के मार्ग से विचलित (योग भ्र्ष्ट) होने का तत्पार्य इस प्रकार है।
द्वितीय अवस्था का साधक मृत्यु को प्राप्त होने पर ज्ञानवान् योगियों के कुल में जन्म लेता है। ज्ञानवान् योगियों के कुल से तात्पर्य है, वह कुल जिसमें पूर्व काल में महापुरुष योगी परमात्मतत्त्व को प्राप्त कर चुके हैं और वर्तमान में स्थित योगी साधना में रत है।
भगवान श्रीकृष्ण कहते है की तत्त्वज्ञ जीवन मुक्त योगी महापुरुषों के कुल में जन्म होना अति दुर्लभ है। कारण कि उन योगियों के कुल में, घर में स्वाभाविक ही पारमार्थिक वायुमण्डल रहता है। वहाँ सांसारिक भोगों की चर्चा ही नहीं होती। अतः वहाँ के वायुमण्डल से, दृश्य से, तत्त्वज्ञ महापुरुषों के सङ्गसे, अच्छी शिक्षा आदि सुगमता से मिल जाती है।
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ है। यह चार पुरुषार्थ को करना ही मनुष्य जीवन का उदेश्य है। उद्देश्य इसलिये है क्योंकि इन चार पुरुषार्थ को करने से ही मनुष्य का कल्याण है। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, का अर्थ क्या है? यह पुरुषार्थ करने से मनुष्य का कल्याण किस प्रकार है? धर्म धर्म का अर्थ है कर्तव्य। श्रीमद […]
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