भावार्थ:
इस श्लोक में गुणों के अनुरूप कार्य करने से किस प्रकार का फल प्राप्त होता है उसका वर्णन किया है।
कार्यों का कोई गुण नहीं होता। अर्थात कार्य न सात्त्विक होते हैं, न राजस और न ही तामस होते हैं। परन्तु उन कार्यों को करने वाला कर्त्ता का भाव सात्त्विक, राजस और तामस होता है।
कार्यों के समान फल का भी कोई गुण नहीं होता। भोक्ता का फल के प्रति भाव गुण के अनुरूप होता है।
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