भगवान श्रीकृष्ण अध्याय २ श्लोक ४१ में कहते है कि, समता को धारण करने के लिये सर्व प्रथम कार्य है, व्यवसायात्मिका बुद्धि करने का। समता के लिये व्यवसायात्मिका बुद्धि न होने पर अनन्त कामनायें होती है। अनन्त कामनाओं का अर्थ है – अशान्ति।
इसी विषय को भगवान श्रीकृष्ण पुनः अन्य प्रकार से कहते है। साधक में जब तक समता में स्थित होने का भाव नहीं होगा, तब तक अन्तःकरण में समता स्थित नहीं हो सकती।
इस श्लोक में व्यवसायात्मिका बुद्धि के लिये भावना पद का प्रयोग किया है। कारण की सम्पूर्ण विषय भाव का ही है। अन्तःकरण की वृत्तियाँ भी भाव है और समता भी भाव है।
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण स्पष्ट करते है कि जब तक अन्तःकरण में समता स्थिर नहीं तब तक मन इन्द्रियों के विषय में विचरण करता रहेगा। अशान्त रहेगा। और जब तक मन अशान्त है तब तक अक्षय सुख की प्राप्ति नहीं हो सकती।
मन में शान्ति होने से सुख की अनुभूति होती है। परन्तु इसके विपरीत संसारिक विषयों से सुख की अनुभूति होने से यह कहना कि मन शान्त है – वह गलत होगा!
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