श्रीमद भगवद गीता : ६०

अध्याय २ श्लोक ६०

 

यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः।

इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः।।२-६०।।

 

हे कौन्तेय! भोग रस होने के कारण यत्न करते हुये भी विद्वान् मनुष्य के मन को प्रमथन इन्द्रियाँ बलपूर्वक हर लेती है। ||२-६०||

 

भावार्थ:

पूर्व श्लोक में व्यक्त किया है कि इन्द्रियों पर नियंत्रण करने से, विषयों का त्याग करने पर भी मनुष्य में भोग रस बना रहता है। रस रहने से क्या होता है, इसका वर्णन इस श्लोक में हुआ है।

इस श्लोक में इन्द्रियों को प्रमथनशील कहा है। कारण की इन्द्रियाँ अपना कार्य निरन्तर रूप से करती रहती है। आँखे जब तक बंद रहगी, तब तक वह नहीं देखेगी। परन्तु जिस समय वह खुलेगी, तुरंत देखने लगेगी, और विषय को मन के समुख प्रस्तुत कर देगी। अतः इन्द्रियों को नियंत्रित करने से योग की सिद्धि नहीं है।

अतः सयंमित अन्तःकरण को करना है। उसमें स्थित वृतियों का त्याग करना है। अन्यथा अन्तःकरण में विषयों के प्रति रस होने से, भोग की लालसा होने से, मन तुरन्त विषय में अनुकूलता-प्रतिकूलता कर लेता है। उस विषय भोग लेने लगता है।

इन्द्रियाँ मन को बलपूर्वक हर लेती है: अर्थात इन्द्रियों के विषयों में आसक्ति होने से, मन विषय में अनुकूलता-प्रतिकूलता कर लेता है। यहाँ मन को हरने का बल आसक्ति में है, विषय में नहीं, इन्द्रियों में नहीं।

श्लोक का परिपेक्ष्य:

जो मनुष्य इन्द्रियों को उनके विषय से हटाना, साधना मानते है, उनके लिये भगवान श्रीकृष्ण कटाक्ष करते हुये उनको “विपश्चितः” (विद्वान्) पुरुष कहते है।

अतः हट पूर्वक विषयों का त्याग करके, या संसार का त्याग करके, या आध्यात्मिक ज्ञान को प्राप्त करके समता की प्राप्ति नहीं की जा सकती। अन्तःकरण सयंमित नहीं हो सकता।

 

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