भावार्थ:
जिसका चित्त भगवान्को छोड़कर किसी भी भोग भूमि में, किसी भी ऐश्वर्य में किञ्चिन्मात्र भी नहीं जाता; जिसके अन्तःकरणमें भगवान्के सिवाय अन्य किसीका कोई आश्रय नहीं है, महत्त्व नहीं है वह पुरुष अनन्य चित्तवाला है। इस प्रकार का विचार जिस के चित में निरन्तर और दीर्घकाल तक (अन्त समय तक) बना रहता है और इस विचार के साथ ही वह मनुष्य धर्म का पालन करता है उसके लिये समता की प्राप्ति और समता में स्थित रहना सुलभ है।
समता की प्राप्ति ही परमात्मा, ब्रहा की प्राप्ति है। इस की स्पष्टता अध्याय ८ श्लोक ३ में हुई है।
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ है। यह चार पुरुषार्थ को करना ही मनुष्य जीवन का उदेश्य है। उद्देश्य इसलिये है क्योंकि इन चार पुरुषार्थ को करने से ही मनुष्य का कल्याण है। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, का अर्थ क्या है? यह पुरुषार्थ करने से मनुष्य का कल्याण किस प्रकार है? धर्म धर्म का अर्थ है कर्तव्य। श्रीमद […]
Read More