भावार्थ:
परमात्मतत्व, जो सम्पूर्ण संसार में व्याप्त है और जो सम्पूर्ण प्राणीओं के होने का कारण है। अर्थात सब परमात्मतत्व से ही उत्पन्न होते हैं; परमात्मतत्व में ही स्थित रहते हैं और परमात्मतत्व में ही लीन होते हैं। उस परमात्मतत्व(परमानन्द) की अनुभूति योग साधना को सिद्ध करने से ही होगी।
अनन्य भक्ति का अर्थ है कि परमात्माके सिवाय किसीकी भी सत्ता और महत्ता न मानना तथा परमात्मा की प्रसन्नता के लिये प्रत्येक क्रिया को करना। परमात्मा की प्रसन्नता है संसार का कल्याण।
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ है। यह चार पुरुषार्थ को करना ही मनुष्य जीवन का उदेश्य है। उद्देश्य इसलिये है क्योंकि इन चार पुरुषार्थ को करने से ही मनुष्य का कल्याण है। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, का अर्थ क्या है? यह पुरुषार्थ करने से मनुष्य का कल्याण किस प्रकार है? धर्म धर्म का अर्थ है कर्तव्य। श्रीमद […]
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