भावार्थ:
पृथ्वी जल तेज वायु और आकाश — इन पञ्चमहाभूतोंसे बनी प्रतिक्षण परिवर्तनशील और नाशवान् सृष्टिको अधिभूत कहते हैं। सम्पूर्ण दृश्यमान जड़ जगत् अधिभूत है। पञ्चमहाभूतों से बना मनुष्य (शरीर, इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि) अधिभूत है।
चेतन तत्व जो शरीर और शरीर में हो नहीं क्रिया का प्रकाशक है वह अधिदैव है। पूर्व श्लोक में वर्णित कर्म (जन्म-मरण रूपी चक्र) का जो कारण है वह अधिदैव है।
शरीर में हो रही अनेक प्रकार की क्रिया, जन्म-मरण रूपी चक्र अधियज्ञ है। विषय रूपी आहुतियाँ इन्द्रियरूपी अग्नि में अर्पण की जाती हैं तब विषय का ज्ञान होता है।
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ है। यह चार पुरुषार्थ को करना ही मनुष्य जीवन का उदेश्य है। उद्देश्य इसलिये है क्योंकि इन चार पुरुषार्थ को करने से ही मनुष्य का कल्याण है। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, का अर्थ क्या है? यह पुरुषार्थ करने से मनुष्य का कल्याण किस प्रकार है? धर्म धर्म का अर्थ है कर्तव्य। श्रीमद […]
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