भावार्थ:
योग स्थित भक्त अन्त समय में योग बल के दुवारा किस प्रकार शरीर का त्याग करे जिससे उसको परमात्मा कि प्राप्ति हो इसका वर्णन इस श्लोक में हुआ है।
योगबल से तात्पर्य साधक के उस बल से है जो उसे दीर्घकाल तक नियमित रूप से ध्यानाभ्यास करने के फलस्वरूप प्राप्त होता है। यह वह आन्तरिक शक्ति है जो मन के विषयों से तथा तज्जनित विक्षेपों से निवृत्त होने पर और बुद्धि के समता में स्थिर होने से प्राप्त होती है और निरन्तर समृद्ध होती जाती है।
भक्त का अर्थ है कि परमात्मा से अन्यथा प्रकृति के विषय, का चिन्तन करने को नहीं है। अहंता का त्याग ही भक्ति है।
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ है। यह चार पुरुषार्थ को करना ही मनुष्य जीवन का उदेश्य है। उद्देश्य इसलिये है क्योंकि इन चार पुरुषार्थ को करने से ही मनुष्य का कल्याण है। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, का अर्थ क्या है? यह पुरुषार्थ करने से मनुष्य का कल्याण किस प्रकार है? धर्म धर्म का अर्थ है कर्तव्य। श्रीमद […]
Read More