भावार्थ:
कितनी ही बड़ी आयु क्यों न हो, वह भी कालकी अवधिवाली ही है। ऊँचे-से-ऊँचे कहे जानेवाले जो भोग हैं, वे भी संयोगजन्य और कुछ समय के लिये होने के कारण, दुःखोंके ही कारण हैं।
ब्रह्मलोक के एक दिन की अवधि मनुष्य के दिन की अवधि से कितनी भी अधिक क्यों न हो, उसका भी अंत होता है। इस प्रकार कालके तत्त्वको जाननेवाले मनुष्य ब्रह्मलोक तक के दिव्य भोगों को किञ्चिन्मात्र भी महत्त्व नहीं देते।
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ है। यह चार पुरुषार्थ को करना ही मनुष्य जीवन का उदेश्य है। उद्देश्य इसलिये है क्योंकि इन चार पुरुषार्थ को करने से ही मनुष्य का कल्याण है। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, का अर्थ क्या है? यह पुरुषार्थ करने से मनुष्य का कल्याण किस प्रकार है? धर्म धर्म का अर्थ है कर्तव्य। श्रीमद […]
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