भावार्थ:
समता प्राप्ति का दृढ़ निश्चय केवल एक समय का नहीं है, अपितु इसका विचार बुद्धि में नित्य धारण किये रखना होता है, अन्यथा मनुष्य शीघ्र ही संसारिक भोगों और संग्रह की ओर आकर्षित हो जाता है।
अतः समता युक्त योगी निरन्तर समता की साधना में लगा हुआ सभी कार्य भगवत कृपा से हो रहे है ऐसे भाव से साथ अपने मनुष्य धर्म का पालन करता है। स्वयं के शरीर में हो रही क्रिया (खाना-पीना, सोना-जगना तथा सांसारिक क्रिया) का कारण भी परमात्मतत्व है जो इस शरीर में व्याप्त है इस प्रसन्नचित विचार के साथ मन को केवल परमात्मा में लगाता है।
अहंता का त्याग करना और सभी कार्यों और क्रिया का कारण परमात्मतत्व है, ऐसी श्रद्धा रखना भक्ति है।
समस्त प्राणियों में और स्वयं में जो एकरूप से केवल परमात्मतत्व व्याप्त है, उसका अभिनन्दन करना, – नमस्कार है।
समस्त प्रकृति-संसार में केवल परमात्मतत्व ही व्याप्त है और प्रकृति में हो रही क्रिया और पदार्थ का कारण परमात्मतत्व ही है। इस विचार के साथ परमात्मा से प्राप्त शरीर को प्रकृति-संसार के कल्याण के लिये सेवा में लगाना कीर्तन है।
अन्य समस्त संसारिक भावों, वासनाओं का त्याग कर, मन में केवल परमात्मा का भाव रखना उपासना है।
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ है। यह चार पुरुषार्थ को करना ही मनुष्य जीवन का उदेश्य है। उद्देश्य इसलिये है क्योंकि इन चार पुरुषार्थ को करने से ही मनुष्य का कल्याण है। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, का अर्थ क्या है? यह पुरुषार्थ करने से मनुष्य का कल्याण किस प्रकार है? धर्म धर्म का अर्थ है कर्तव्य। श्रीमद […]
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