भावार्थ:
यह विषय जो की धर्म युक्त है उसमें श्रद्धा का भाव न रख कर इसमें दोष-दृष्टि का भाव रखे गा, वह परमात्मतत्व को प्राप्त न होकर उस मृत्युरूपी संसार को प्राप्त है जिसमें विनाश-ही-विनाश है, अभाव ही अभाव है और जन्म-मरण बना ही रहेगा।
इस श्लोक में भी का भाव नहीं है अपितु श्रेष्ठा का भाव है।
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ है। यह चार पुरुषार्थ को करना ही मनुष्य जीवन का उदेश्य है। उद्देश्य इसलिये है क्योंकि इन चार पुरुषार्थ को करने से ही मनुष्य का कल्याण है। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, का अर्थ क्या है? यह पुरुषार्थ करने से मनुष्य का कल्याण किस प्रकार है? धर्म धर्म का अर्थ है कर्तव्य। श्रीमद […]
Read More