भावार्थ:
जिस प्रकार व्यापक आकाश में, सब जगह विचरनेवाली महान् वायु नित्य ही स्थित रहती है। वायु में अनेक प्रकार की क्रिया होती है, परन्तु आकाश निश्छल एवं स्थिर रहता है। वायु आकाश में स्थित है और वायु आकाशसे कभी अलग हो ही नहीं सकती। उसी प्रकार परमात्मतत्व व्यापक है और समस्त सृष्टि उसमे स्थित है। सृष्टि में हो रही क्रिया का कारण तो परमात्मतत्व है परन्तु कर्ता नहीं है।
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ है। यह चार पुरुषार्थ को करना ही मनुष्य जीवन का उदेश्य है। उद्देश्य इसलिये है क्योंकि इन चार पुरुषार्थ को करने से ही मनुष्य का कल्याण है। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, का अर्थ क्या है? यह पुरुषार्थ करने से मनुष्य का कल्याण किस प्रकार है? धर्म धर्म का अर्थ है कर्तव्य। श्रीमद […]
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