भावार्थ:
जिस प्रकार भगवान मनुष्य को सम भाव में रहने को कहते है, उसी प्रकार भगवान स्वयं भी सम भाव रखते है। चाहें मनुष्य साधक हो, या भोगी, सकाम कर्म करता हो या निष्काम कर्म, आसुरी प्रकृति का हो या देवी प्रकृति का, परमात्मा किसी में भी राग-द्वेष नहीं करते।
परन्तु जो भक्तिपूर्वक मनुष्य धर्म का पालन करते है और चिंतन केवल परमात्मा का ही होता है, तो मैं (परमात्मतत्व) उनमें समता रूप से स्थित रहता हूँ।
जब योग स्थित साधक स्वयं की कोई स्वत्रंत सत्ता ही नहीं मानता तो वह साधक परमात्मतत्व (वे मेरे में) ही है।
यहाँ परमात्मा में राग-द्वेष का न होना केवल प्रतीकात्मक वक्तव्ये है। कारण कि परमात्मतत्व में न कोई क्रिया है न भाव। राग-द्वेष न होने का अर्थ है कि परमात्मतत्व समान रूप से व्याप्त है, केवल मनुष्य को परमात्मतत्व अनुभव करना है। जो योग में स्थित होता है उसको समता रूप से अनुभव में आते है, अन्य को नहीं।
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ है। यह चार पुरुषार्थ को करना ही मनुष्य जीवन का उदेश्य है। उद्देश्य इसलिये है क्योंकि इन चार पुरुषार्थ को करने से ही मनुष्य का कल्याण है। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, का अर्थ क्या है? यह पुरुषार्थ करने से मनुष्य का कल्याण किस प्रकार है? धर्म धर्म का अर्थ है कर्तव्य। श्रीमद […]
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