सृष्टि के घटक (देव), सृष्टि चक्र (यज्ञ) के प्रभाव में मनुष्य को उनके जीवन-निर्वाह और अन्य कार्यों के लिये आवश्यक सामग्री मनुष्य को देते रहेंगे।
जीवन-निर्वाह के लिये मनुष्य जब कोई कार्य करता है, तब उसको कार्य के फल स्वरूप जो भी प्राप्त होता है वह उसको सृष्टि के घटक से ही प्राप्त होता है।
वृक्ष, लता, आदि में स्वतः ही फल-फूल लगते हैं; परन्तु यदि मनुष्य उन्हें खाद-पानी दे और उनकी देखभाल करे तो उनमें फल-फूल विशेषता से लगते हैं। अन्तः फल-फूल प्राप्त सृष्टि के घटकों से ही होते है। खती करने पर प्रकृति मनुष्य के जीवन निर्वह के लिये अनाज प्रदान करती है। खती मनुष्य करता है, परन्तु अनाज प्रकृति प्रदान करती है।
भगवान श्रीकृष्ण कहते है कि, जो मनुष्य प्रकृति से प्राप्त हुई सामग्री (भोजन, वस्त्र, धन, मकान आदि) को समाज की सेवा में लगाये बिना स्वयं ही उसका उपभोग करता है, वह देवताओं के स्वत्व (परोपकार) का हरण करने वाला, और निश्चय ही समाज और प्रकृति का चोर है।
भूमण्डल मे पशु, पक्षी, व्रक्ष, एवं अन्य वनस्पति आदि, के कार्य केवल और केवल प्रकृति के लिय हैं। उनका कार्य करने में कोई अपना सकाम भाव नहीं है। पशु, पक्षी, आदि को जो भी खाध सामग्री प्राप्त होती है, वह उस सामग्री का प्रयोग केवल अपने निर्वाह के लिय करते है और किसी प्रकार का संग्रह नहीं करते। वे स्वयं को दूसरों के सुखमें समर्पित कर देते हैं। यद्यपि पशु-पक्षी आदिको यह ज्ञान नहीं रहता कि हम परोपकार कर रहे हैं, तथापि उन के द्वारा दूसरों का उपकार स्वतः होता रहता है।
मनुष्य को जीवन निर्वाह, और जीवन सुरक्षा के लिये अनेक प्रकार के कार्य करने की आवश्यकता होती है। उन अनेक प्रकार के कार्यों को करने के लिये मनुष्य में अनेक प्रकार की क्षमता की आवश्यकता होती है, जो सभी मनुष्यों में सामान रूप से उपलब्ध नहीं होती। कुछ मनुष्यों मे कुछ गुण (क्षमता एवं शक्ति) होता है और अन्य मे कुछ ओर। इस कारण मनुष्य समाजिक व्यवस्था में रहता है। अर्थात मनुष्य अपने-अपने गुणों के अनुसार मिल-जुल कर जीवन निर्वाह, और जीवन सुरक्षा के कार्य करते है। कार्य करने के लिये साधन सामग्री (प्राणी, वनस्पति, खनिज एवं अन्य पदार्थ) मनुष्य को प्रकृति (भूमण्डल) से प्राप्त होती है।
अतः इस समाजिक व्यवस्था में हर मनुष्य का समाज के प्रति कर्तव्य होते है, जो उनके गुणों के आधार पर निर्धारित होते है। मनुष्य का कर्तव्य यह भी होता है कि कार्य करने पर उसको जो साधन सामग्री भूमण्डल से प्राप्त होती है, वह स्वयं के साथ, समाज के अन्य लोगों के साथ भी साझा करे।
पहला – वह मनुष्य को आश्वासन देते है कि प्रकृति (भूमण्डल) से उसको, उसके जीवन व्यापन के लिये पर्याप्त मात्रा में साधन सामग्री मिलती रहगी, अगर वह उनका संरक्षण करेगा, उनकी वृद्धि के लिये कार्य करेगा और उनका प्रयोग निर्वाह मात्र के लिए करेगा। जो मनुष्य इन साधन सामग्री का संग्रह भोग के लिये करेगा, नष्ट करेगा वह देवताओं (साधन सामग्री) के परोपकार का हरण (व्यर्थ) करेगा।
दूसरा – जो मनुष्य प्रकृति से प्राप्त साधन सामग्री का उपयोग एवं संग्रह केवल अपने भोग के लिये करेगा और प्राप्त साधन सामग्री समाज को समर्पित (सेवा) नहीं करेगा वह समाज का चोर है।
अध्यात्म दृष्टि से भी देखा जाय तो मनुष्य को मनुष्य शरीर परमात्मा से प्राप्त हुआ है। मनुष्य का पालन-पोषण उसके माता-पिता द्वारा होता है। विध्या उसको गुरूजनों से मिलती है। संसार में वह जो भी कार्य करता है उसमें प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से समाज के अन्य लोगो का योगदान होता है। कार्य के लिये साधन सामग्री और के फल प्रकृति से प्राप्त होता है। इस प्रकार मनुष्य के पास जो कुछ भी सामग्री – बल, योग्यता, पद, अधिकार, धन, सम्पत्ति आदि है वह सब-की-सब दूसरोंसे ही मिली है। इसलिये इनको दूसरोंकी ही सेवामें लगाना है। यही मनुष्य का परम कर्तव्य है। “मनुष्य धर्म है“।
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ है। यह चार पुरुषार्थ को करना ही मनुष्य जीवन का उदेश्य है। उद्देश्य इसलिये है क्योंकि इन चार पुरुषार्थ को करने से ही मनुष्य का कल्याण है। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, का अर्थ क्या है? यह पुरुषार्थ करने से मनुष्य का कल्याण किस प्रकार है? धर्म धर्म का अर्थ है कर्तव्य। श्रीमद […]
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