आकाशगंगा, नक्षत्र, सौरमंडल, भूमण्डल (भूमण्डल मे वायु, अग्नि, जल, व्रक्ष, पशु, पक्षी, और समस्त प्रदार्थ), सृष्टि के घटक है। इन सब को मिला कर सम्पूर्ण सृष्टि प्रतिष्ठित है।
सनातन धर्म संस्कृति में यह सभी घटक दिव्यरूप में देखे और पूजे जाते है और इनको देवता पद से सम्बोधित करते है। कारण की, ये सभी सृष्टि चक्र को बनाय रखने में अपना-अपना योगदान देते हैं और मनुष्य का जीवन निर्वाह इन के सहयोग से ही होता है।
यज्ञ सिद्धान्त यह कहता है कि सृष्टि के अस्तित्व का कारण, सृष्टि का गतिशील होना है। सृष्टि के गतिशील होने के दो कारण है:
ब्रह्माजी मनुष्य से कहते हैं कि जिस प्रकार सृष्टि के सभी घटक अपने कार्यों से अन्यों को प्रभावित (उन्नत) करते है, उसी प्रकार तुम भी अन्यों (मनुष्य समाज) का सहयोग, और उन्नति के लिये कार्य करो।
ऐसा करने से तुम लोग अपने जीवन उद्देश्य की परम् श्रेष्ठा को प्राप्त होंगे।
इस श्लोक के परस्परं पद में यह सभी श्रेणी आ जाती है:
श्रेयः पद के दो भाव है:
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ है। यह चार पुरुषार्थ को करना ही मनुष्य जीवन का उदेश्य है। उद्देश्य इसलिये है क्योंकि इन चार पुरुषार्थ को करने से ही मनुष्य का कल्याण है। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, का अर्थ क्या है? यह पुरुषार्थ करने से मनुष्य का कल्याण किस प्रकार है? धर्म धर्म का अर्थ है कर्तव्य। श्रीमद […]
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