पूर्व श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण, कहते है कि कर्मयोग में कार्यों को किस प्रकार से करना चाहिये। अब इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण कहते है, कि कर्मयोग में कार्य कौन से करने है।
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से दो प्रकार के कार्य करने को कहते है।
शरीर-निर्वाह सम्बन्धी कार्य। अर्थात स्वधर्म।
नियति से प्राप्त कार्य। अर्थात परिस्थिति वश प्राप्त हुये कार्य।
नियति से प्राप्त कार्य को न करने की अपेक्षा, करना श्रेष्ठ है। कारण की, नियति से प्राप्त कार्य को करने से मनुष्य का कल्याण होता है। और जिस कार्य से कल्याण होता हो, वह कार्य श्रेष्ठ है।
वर्तमान में अर्जुन को युद्ध नियति से प्राप्त हुआ है। क्षत्रिय होने के कारण, युद्ध करना अर्जुन का स्वधर्म भी है। मनुष्य अपने स्वधर्म का पालन शरीर-निर्वाह के लिये भी करता है। अतः भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते है कि स्वधर्म का पालन न करने से तुम्हारा शरीर-निर्वाह भी सिद्ध नहीं होगा। अतः युद्ध करो।
नियत कर्म करने से मनुष्य में कामना का त्याग होता है, और कार्य, पदार्थ के प्रति राग- द्वेष का त्याग होता है। कार्य में आसक्ति (सम्बन्ध) का त्याग करने से अहंता (मैं करता हूँ) का त्याग होता है।
कामना, ममता, अहंता, राग- द्वेष के त्याग से ही समता की प्राप्ति होती है।
नियत कर्म अगर शरीर को कष्ट देने वाले हो अथवा मन में व्यथा उत्त्पन्न करने वाले हो, तो भी उन कार्यों को निश्चित रूप से करना चाहिये। अन्यथा वह कर्मों का त्याग होगा। अध्याय २ श्लोक ४७ में भगवान ने स्पष्ट कहा है कि हे अर्जुन! तेरी कर्म न करने में आसक्ति न हो।
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ है। यह चार पुरुषार्थ को करना ही मनुष्य जीवन का उदेश्य है। उद्देश्य इसलिये है क्योंकि इन चार पुरुषार्थ को करने से ही मनुष्य का कल्याण है। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, का अर्थ क्या है? यह पुरुषार्थ करने से मनुष्य का कल्याण किस प्रकार है? धर्म धर्म का अर्थ है कर्तव्य। श्रीमद […]
Read More