मनुष्य द्वारा होने वाले कार्य का कारण है मनुष्य की स्वयं की प्रकृति। मनुष्य की प्रकृति बनती है, तीन गुणों (त्रिगुण) से, जिनका नाम है – सत्त्व, रज और तम।
यहाँ ‘कर्म’ शब्द का प्रयोग क्रिया के लिये हुआ है।
‘कश्चित्’ – कोई भी – अर्थात योग प्राप्ति के लिये कर्म, ज्ञान और भक्ति मार्ग का अनुसरण करने वाले साधक कर्म किये बिना नहीं रह सकते।
‘क्षणम्’ – किसी भी क्षण – शरीर में और शरीर से निरन्तर कुछ न कुछ क्रिया होती रहती है। इन क्रियाओं में वाचिक, मानसिक, और शारीरिक, सभी प्रकार की क्रिया आ जाती है। जीवन निर्वाह सम्बन्धी कार्य भी क्रियाओं में आते है।
‘जातु’ – किसी भी अवस्था में – कार्य करने की प्रवृति हो या निवृति। प्राप्त परिस्थिति में कार्य को न करना भी कर्म (कार्य) है। एकान्त में बेठना भी कर्म (कार्य) है।
भगवान श्रीकृष्ण कहते है कि त्रिगुण से मनुष्य की प्रकृति बनती है। मनुष्य अपनी प्रकृति से बाध्य होकर अनेक प्रकार के कार्य करता ही है। इस विषय पर विस्तार से वर्णन, भगवान श्रीकृष्ण अध्याय ३ श्लोक २७ से श्लोक ३३ में करते है।
पूर्व श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण, क्रिया करने की अनिवार्यता के लिये तीन कारण कहते है। साथ ही इस श्लोक में कहते है कि कोई भी मनुष्य, हर क्षण, हर अवस्था में क्रिया करता ही है – होती ही है।
क्योकि सृष्टि परिवर्तन शील है, उसके कारण परिस्थिति में निरन्तर परिवर्तन आता रहता और मनुष्य उस परिस्थिति और अपने प्रकृति के प्रभाव के अनुसार कर्म करता ही है।
अतः जब क्रिया होती ही है, और होनी ही है, तब मनुष्य वह कार्य करे, जो करने अनिवार्य है। और उस प्रकार करे, जिसमें उसका कल्याण होता हो।
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ है। यह चार पुरुषार्थ को करना ही मनुष्य जीवन का उदेश्य है। उद्देश्य इसलिये है क्योंकि इन चार पुरुषार्थ को करने से ही मनुष्य का कल्याण है। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, का अर्थ क्या है? यह पुरुषार्थ करने से मनुष्य का कल्याण किस प्रकार है? धर्म धर्म का अर्थ है कर्तव्य। श्रीमद […]
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