श्रीमद भगवद गीता : ०४

अध्याय ३ श्लोक ०४ – कर्म करने से ही देव सिद्धि और योग सिद्धि है

 

न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते।
न च संन्यसनादेव सिद्धिं समाधिगच्छति।।३-४।।

 

 

मनुष्य न तो कर्मों का आरम्भ किये बिना नैर्ष्कम्य को प्राप्त है। न कर्मों के त्याग से देव सिद्धि है, और न ही समता (परम् शान्ति) की प्राप्ति है। ||३-४||

 

भावार्थ:

इस श्लोक में कर्म (कार्य) करने की अनिवार्यता तीन कारणों से कही गई है।

नैष्कर्म्यम् अश्नुते

मनुष्य जब तक कर्म करेगा नहीं, तब तक वह कर्म-कर्मफल के बन्धन से मुक्त नहीं होता। इसका कारण अध्याय ४ में विस्तार से दिया है।

देव सिद्धि

भगवान श्रीकृष्ण कहते है कि कार्यों से सन्यास लेने से देव सिद्धि भी नहीं होती।

मनुष्य जीवन का उदेश्य है, देव सिद्धि के लिये कार्य करना। इसी को मनुष्य धर्म भी कहते है। देव सिद्धि के लिये क्या कार्य करने है और किस प्रकार करने है , इसका वर्णन अध्याय ३ श्लोक १० से किया है।

समता (परम् शान्ति) की प्राप्ति

समता प्राप्ति के विषय में भगवान श्रीकृष्ण में अध्याय २ में कहा और आगे सम्पूर्ण श्रीमद् भगवद् गीता, कई प्रकार से कहा है। संसारिक कार्य करने पर ही समता में अचल स्थिति है।

श्लोक का परिपेक्ष्य:

  1. कार्य करने में जो अहंता है (मैं करता हूँ) उसका त्याग तभी है, जब कार्य किया जायगा।
  2. संसार और संसारिक पदार्थों और प्राणी के सम्पर्क में आने पर और उनके साथ व्यवहार करने पर आसक्ति होती है। आसक्ति का त्याग तभी सिद्ध है, जब व्यवहार किया जाय, और पदार्थ, प्राणी के प्रति आसक्ति उत्त्पन्न न हो।
  3. संसारिक पदार्थों के प्राप्त होने पर उत्त्पन्न स्पृहा का त्याग तभी सिद्ध है जब पदार्थों को प्राप्त किया जाय और अन्तःकरण में स्पृहा न हो।
  4. कार्य को करने में अथवा न करने में, कामना कारण है। कामना का त्याग तभी सिद्ध है, जब कार्य बिना कामना के हो।

इस श्लोक से सिद्ध होता है कि भगवान श्रीकृष्ण कर्मों को स्वरूप से त्याग करने की आज्ञा नहीं देते, अपितु कर्म करने की आज्ञा देते है। परन्तु कर्मों में जो कामना, राग-द्वेष, ममता, आसक्ति, और अहंता है, उसका त्याग करो, ऐसा कहते हैं।

 

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