इस श्लोक में कर्म (कार्य) करने की अनिवार्यता तीन कारणों से कही गई है।
नैष्कर्म्यम् अश्नुते
मनुष्य जब तक कर्म करेगा नहीं, तब तक वह कर्म-कर्मफल के बन्धन से मुक्त नहीं होता। इसका कारण अध्याय ४ में विस्तार से दिया है।
देव सिद्धि
भगवान श्रीकृष्ण कहते है कि कार्यों से सन्यास लेने से देव सिद्धि भी नहीं होती।
मनुष्य जीवन का उदेश्य है, देव सिद्धि के लिये कार्य करना। इसी को मनुष्य धर्म भी कहते है। देव सिद्धि के लिये क्या कार्य करने है और किस प्रकार करने है , इसका वर्णन अध्याय ३ श्लोक १० से किया है।
समता (परम् शान्ति) की प्राप्ति
समता प्राप्ति के विषय में भगवान श्रीकृष्ण में अध्याय २ में कहा और आगे सम्पूर्ण श्रीमद् भगवद् गीता, कई प्रकार से कहा है। संसारिक कार्य करने पर ही समता में अचल स्थिति है।
इस श्लोक से सिद्ध होता है कि भगवान श्रीकृष्ण कर्मों को स्वरूप से त्याग करने की आज्ञा नहीं देते, अपितु कर्म करने की आज्ञा देते है। परन्तु कर्मों में जो कामना, राग-द्वेष, ममता, आसक्ति, और अहंता है, उसका त्याग करो, ऐसा कहते हैं।
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ है। यह चार पुरुषार्थ को करना ही मनुष्य जीवन का उदेश्य है। उद्देश्य इसलिये है क्योंकि इन चार पुरुषार्थ को करने से ही मनुष्य का कल्याण है। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, का अर्थ क्या है? यह पुरुषार्थ करने से मनुष्य का कल्याण किस प्रकार है? धर्म धर्म का अर्थ है कर्तव्य। श्रीमद […]
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