अध्याय ३ श्लोक ५ में भगवान श्रीकृष्ण कहते है कि मनुष्य सभी कार्य को, मनुष्य की प्रकृति के वश होकर करता है। इसी बात को इस श्लोक में पुनः कहा गया है।
पूर्व श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण कहते है कि, मनुष्य कार्य को न करे, ऐसा सम्भव नहीं है। मनुष्य की प्रकृति उससे कार्य करवा ही लेगी। इस श्लोक में कहते है कि, यह मनुष्य की अहंता है जब वह यह मानता है कि वह कार्य को करता है। मनुष्य शरीर से होने वाले कार्यों का कारण उसकी प्रकृति है न की उसकी बुद्धि अथवा चेतना।
जिस समष्टि शक्ति से सृष्टि प्रतिष्ठित और गतिशील है, उसी समष्टि शक्ति से सृष्टि में स्थित मनुष्य शरीर भी क्रियाशील है।
मनुष्य शरीर में दो प्रकार से क्रिया होती है।
प्रथम श्रेणी में है शरीर की उत्त्पति (जन्म), शरीर का बढ़ना, श्वास क्रिया, पाचन क्रिया, रक्त क्रिया आदि।
दूसरे श्रेणी में ज्ञानेन्द्रियाँ, कर्मेन्द्रियाँ, मन और बुद्धि से होनी वाली क्रिया। जैसे, देखना, सुनना, खाना, चलना, विचार करना आदि आता है।
इन सभी क्रियाओं के होने का कारण, मनुष्य को प्राप्त उसकी प्रकृति है। मन और बुद्धि के द्वारा होने वाले कार्य का कारण, मनुष्य में स्थित त्रिगुण (सत्व, रज और तम) और संस्कार है।
बुद्धि प्रथम श्रेणी की क्रिया का कारण तो समष्टि शक्ति को मानता है, परन्तु द्वितीय श्रेणी की क्रिया को बुद्धि अज्ञानता वश स्वयं के द्वारा होने वाले कार्य मान लेता है। इस का कारण इस प्रकार है:
मनुष्य की बुद्धि को “मैं हूँ” का जो अनुभव, ज्ञान होता है, वह चेतन तत्व से प्राप्त होता है। इस अनुभव, ज्ञान का प्रकाशक चेतन तत्व है जो बुद्धि से परे है।
यह सत्य है कि ज्ञानेन्द्रियाँ, कर्मेन्द्रियाँ, मन और बुद्धि से होने वाले कार्यों का ज्ञान बुद्धि को होता है और बुद्धि ही ज्ञानेन्द्रियाँ, कर्मेन्द्रियाँ को कार्य करने का निर्देशन करती है। परन्तु कार्यों का ज्ञान और निर्देशन बुद्धि द्वारा तभी सम्भव है जब बुद्धि में चेतना का प्रकाशन चेतन तत्व से हो।
अतः बुद्धि को चेतना (“मैं हूँ”) का ज्ञान तो होता है, पर वह ज्ञान कहा से प्राप्त हो रहा है, इसका ज्ञान नहीं होता। क्योकि संसार के सभी विषयों का ज्ञान और निर्देशन बुद्धि द्वारा होता है, तो बुद्धि अज्ञानता वश चेतना की अनुभूति स्वयं की उत्त्पति मान लेता है।
बुद्धि चेतन तत्व से प्रकाशमान होकर इन्द्रियाँ (ज्ञानेन्द्रियाँ, कर्मेन्द्रियाँ) और मन के कार्य को द्रष्टा रूप से देखती है। क्योकि बुद्धि (इन्द्रियों के दुवारा) द्रष्टा रूप से संसार के विषय को देखती है, तो संसार दृश्य हो जाता है, इसलिये बुद्धि (शरीर) स्वयं को संसार से अलग अनुभव करता है।
क्योकि शरीर का अलग होने का अनुभव शरीर में स्थित इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि के दुवारा हो रहा है और साथ ही “मैं हूँ” का अनुभव भी हो रहा है, इसलिये बुद्धि स्वयं के होने के अनुभव और संसार से अलग शरीर होने को एक साथ मान कर “मैं शरीर हूँ” ऐसा मान लती है।
इस अज्ञानता के कारण मनुष्य (बुद्धि), शरीर (ज्ञानेन्द्रियाँ, कर्मेन्द्रियाँ, मन और बुद्धि) से होने वाले कार्यों का कर्त्ता स्वयं को मान लेता है। इस कारण, मनुष्य (बुद्धि) “मैं कार्य को करता हूँ” और “मैं कार्य से प्राप्त फल का कारण हूँ” इस प्रकार का अहंकार कर लेता है।
जैसे, कोई व्यक्ति पढ़ा-लिखा नहीं है, तो वह कहता है कि ‘मैं अनपढ़ हूँ’ और पढ़-लिखकर वही व्यक्ति कहता है कि ‘मैं विद्वान् हूँ’। इस प्रकार शरीर-बुद्धि की अवस्था (अनपढ़, विद्वान्) बदलनेपर भी अपनी सत्ता (‘मैं हूँ’) नहीं बदली। परन्तु शरीर-बुद्धि की अवस्था (अनपढ़, विद्वान्) के साथ अपना सम्बन्ध जोड़ने से (‘मैं अनपढ़ हूँ’) अन्तःकरण (बुद्धि) में ‘अहंकार’ रूपी वृति उत्तपन्न होती है।
बुद्धि के सभी कार्य त्रिगुण और संस्कार के प्रभाव में होते है। बुद्धि की कार्य करने में कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं है। अतः बुद्धि, मन, पांच इन्द्रियाँ, पांच कर्मेन्द्रियाँ, से होने वाले सभी कार्यों का कारण, मनुष्य की प्रकृति और उसके गुण (सत्व, रज और तम) है, बुद्धि का अहंकार नहीं।
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