अध्याय २ श्लोक ३१ से अध्याय २ श्लोक ३७ तक भगवान श्रीकृष्ण, अर्जुन को अपने स्वधर्म का पालन, अर्थात युद्ध करने को कहते है।
अध्याय २ श्लोक ३९ में भगवान श्रीकृष्ण कहते है कि समता से युक्त बुद्धि होने से तुम कर्मबन्धन से मुक्त हो जाओगे। अर्जुन, इसका अर्थ यह लेते है की, समता से युक्त होने पर उनको कर्म नहीं करने होंगे।
तत्पश्चात् अध्याय २ श्लोक ४९ में ‘बुद्धियोग की अपेक्षा सकामकर्म निकृष्ट है’ पद से अर्जुन यह मानते है कि कर्म से ज्ञान अति श्रेष्ठ है।
यह सब विचार अर्जुन को विपरीत भान पड़ते है और भृमित करने वाले लगते है ।
क्योकि अर्जुन अपना कल्याण करना चाहते है, अतः साधना के लिये एक निश्चित मार्ग को जानना चाहते है, जो उनका कल्याण करने वाला हो।
साधना में समता प्राप्ति अथवा वृतियों का त्याग – दोनों ही बुद्धि के कार्य है। परन्तु इस साधना की सिद्धि, संसारिक कार्य करने पर होती है, संसार का त्याग करने से नहीं।
समता की प्राप्ति, वृतियों का त्याग और संसारिक कर्तव्यों का पालन – इन तीनों से ही मनुष्य और संसार का कल्याण होता है। और यह ही योग साधना है।
इस तथ्य को ही भगवान श्रीकृष्ण इस अध्याय में व्यक्त करते है।
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