अध्याय २ श्लोक ६ में अर्जुन ने कहा था कि हम लोगों को इसका भी पता नहीं है, कि युद्ध में हम उनको जीतेंगे या वे हमको जीतेंगे। अर्जुनके इस सन्देहको लेकर भगवान् यहाँ स्पष्ट कहते हैं कि अगर युद्धमें तुम कर्ण आदिके द्वारा मारे जाओगे तो कर्तव्य का पालन करते हुए वीरगति को प्राप्त होंगे, और अगर युद्ध में तुम्हारी जीत हो जायगी तो यहाँ पृथ्वी पर राज्य का सुख भोगों गे।
अध्याय १ श्लोक ४० में अर्जुन कहते हैं – युद्ध के परिणाम में नरक की प्राप्ति होगी। इस के उत्तर में भगवान् कहते हैं – युद्ध करने से स्वर्गकी प्राप्ति होगी।
मनुष्य जीवन को उद्देश्य पृथ्वी का भोग भोगने का नहीं होना चाहिये ऐसी शिक्षा भगवान् श्रीकृष्ण ने पूर्ण गीता में स्पष्टा से कई बार दी है। फिर प्रश्न उठता है कि इस श्लोक में राज्य का सुख भोगने को क्यों कहा गया है।
इसके दो करण है।
प्रथम : बड़े उद्देश्य की प्राप्ति के लिये कई बार मनुष्य को उसकी ही भाषा में समझाना पड़ता है। भगवान् श्रीकृष्ण के लिये, समाज में फहले हुए अधर्म का नाश करने के लिये युद्ध का होना अनिवार्य था। भगवान् श्रीकृष्ण लिये यह एक विकट परिस्थिति थी कि युद्ध शुरू होने से पूर्व अर्जुन शोकाकुल होकर युद्ध न करने का निश्चय कर लेते है। अतः भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन को युद्ध करने के लिये प्ररित किसी भी प्रकार करना चाहते थे।
दूसरा : धर्म की स्थापना पुरे समाज के किये कल्याण करने वाली थी और भोग की वृति केवल एक मनुष्य के लिये थी, जिसको भगवान् श्रीकृष्ण मानते थे, की, सखा होने के नाते अर्जुन की भोग वृति को वह युद्ध उपरान्त समाप्त करने में अर्जुन की साहयता कर सकते थे।
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ है। यह चार पुरुषार्थ को करना ही मनुष्य जीवन का उदेश्य है। उद्देश्य इसलिये है क्योंकि इन चार पुरुषार्थ को करने से ही मनुष्य का कल्याण है। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, का अर्थ क्या है? यह पुरुषार्थ करने से मनुष्य का कल्याण किस प्रकार है? धर्म धर्म का अर्थ है कर्तव्य। श्रीमद […]
Read More