श्रीमद भगवद गीता : ०६

द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन् दैव आसुर एव च।

दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे श्रृणु ।।१६-६।।

 

इस लोकमें दो तरहके प्राणियोंकी सृष्टि है, – दैवी और आसुरी। दैवी सम्पदा तो मैंने विस्तारसे वर्णन कर दिया, अब हे पार्थ! तुम मेरेसे आसुरीका विस्तार सुनो। ।।१६-६।।

 

भावार्थ:

भगवान् श्री कृष्ण इस श्लोक में स्पष्ट करते है कि मनुष्य केवल दो प्रकार के होते है – दैवी और आसुरी। यह दो प्रकार मनुष्य को उनके जीवन आचरण से विभाजित करते है। मनुष्य जब प्रकृति से सम्बन्ध मान कर प्रकृति के समुख हो जाता है तब उसके आचरण आसुरी होते है। जब मनुष्य प्रकृतिसे विमुख होकर केवल परमात्माके सम्मुख हो जाता है, तब उसमें दैवीसम्पत्ति जाग्रत् हो जाती है।

आसुरी सम्पत्ति को ग्रहण करने की अथवा त्याग करने की योग्यता केवल मनुष्य में है। आसुरी सम्पत्ति का त्याग एवं दैवी सम्पदा को धारण करने के लिये ही मनुष्य को मनुष्य योनि प्राप्त होती है। अतः जो मनुष्य आसुरी सम्पत्ति का त्याग एवं दैवी सम्पदा को धारण नहीं करता उसका मनुष्य जीवन व्यर्थ चला जाता है।

 

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