भावार्थ:
भगवान श्री कृष्ण इस श्लोक में पश्चात्ताप भाव से कहते है कि मूढ़ मनुष्य को दुर्लभ अवसर के रूप में मनुष्य शरीर प्राप्त हुआ था, जिस से वह अपना उद्धार, कल्याण कर सकता था, परन्तु वह आसुरी प्रकृति को ग्रहण कर लेता है। जो मनुष्य शरीर परमात्मा को प्राप्त करने के लिये मिला था उसको जन्म-जन्मान्तर के लिये आसुरी योनि की ओर धकेल दिया।
अतः आसुरी अवगुणों को ग्रहण करने वाला मनुष्य न केवल आसुरी योनि को प्राप्त हो कर कष्ट भोगता है, अपितु उससे भी अधिक अधम गति (भयङ्कर नरकों) को प्राप्त होता है।
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ है। यह चार पुरुषार्थ को करना ही मनुष्य जीवन का उदेश्य है। उद्देश्य इसलिये है क्योंकि इन चार पुरुषार्थ को करने से ही मनुष्य का कल्याण है। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, का अर्थ क्या है? यह पुरुषार्थ करने से मनुष्य का कल्याण किस प्रकार है? धर्म धर्म का अर्थ है कर्तव्य। श्रीमद […]
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