भावार्थ:
देवी सम्पदा प्राप्त मनुष्य के गुणों पर विचार करे तो यह स्पष्ट हो जाता है कि, देवी सम्पदा को प्राप्त मनुष्य के सभी कार्य संसार के कल्याण के लिए स्वत: ही होंगे। इन को प्राप्त साधक में सारे विकार समाप्त हो जाते है और वह सभी बन्धनों से मुक्त हो जाता है।
परन्तु आसुरी सम्पति को प्राप्त मनुष्य संसार की सभी विषमताओं से बँधा रहता है।
अर्जुनके अन्तःकरणमें यह संशययुक्त विचार उत्पन्न हुआ देखकर, कि क्या मैं आसुरी सम्पत्ति से युक्त हूँ अथवा दैवी सम्पदा से भगवान् श्री कृष्ण कहते है कि हे पाण्डव तुम शोक मत करो। तुम पाण्डु पुत्र हो, अतः तुम दैवी सम्पदा को लेकर उत्पन्न हुए हो। अर्थात् तुम समाज का कल्याण करने वाले हो और भविष्यमें तुम्हारा भी कल्याण होनेवाला है।
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ है। यह चार पुरुषार्थ को करना ही मनुष्य जीवन का उदेश्य है। उद्देश्य इसलिये है क्योंकि इन चार पुरुषार्थ को करने से ही मनुष्य का कल्याण है। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, का अर्थ क्या है? यह पुरुषार्थ करने से मनुष्य का कल्याण किस प्रकार है? धर्म धर्म का अर्थ है कर्तव्य। श्रीमद […]
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