भावार्थ:
आसुरी प्रकृति वाले मनुष्य अहङ्कार, बल, घमण्ड, काम और क्रोध के आश्रित रहते है और इन्हें ही श्रेष्ठ गुण मानकर इनका अवलम्बन भी करते है। आसुरी मनुष्य स्वयं को तो ईश्वर मानता है और परमात्मा को स्वयं के समान मनुष्य मानता है। और जिस प्रकार वह अन्य मनुष्यों से द्वेष करता है उसी प्रकार परमात्मा से भी द्वेष करता है। जब भी उसको अपने कार्य में सफलता नहीं मिलती तब वह उसका दोष परमात्मा पर मड देता है।
परमात्मतत्व ही संसार का कारण है, इस विचार को दोष पूर्ण और निरर्थक मानता है। उसका यह ही मानना होता है कि सभी कार्य उसके द्वारा किये जाते है और उसके समान अन्य मनुष्य करते है। इसमें परमात्मा का कोई योगदान नहीं है।
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ है। यह चार पुरुषार्थ को करना ही मनुष्य जीवन का उदेश्य है। उद्देश्य इसलिये है क्योंकि इन चार पुरुषार्थ को करने से ही मनुष्य का कल्याण है। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, का अर्थ क्या है? यह पुरुषार्थ करने से मनुष्य का कल्याण किस प्रकार है? धर्म धर्म का अर्थ है कर्तव्य। श्रीमद […]
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