भावार्थ:
भगवान् श्री कृष्ण इस श्लोक में स्पष्ट करते है कि मनुष्य केवल दो प्रकार के होते है – दैवी और आसुरी। यह दो प्रकार मनुष्य को उनके जीवन आचरण से विभाजित करते है। मनुष्य जब प्रकृति से सम्बन्ध मान कर प्रकृति के समुख हो जाता है तब उसके आचरण आसुरी होते है। जब मनुष्य प्रकृतिसे विमुख होकर केवल परमात्माके सम्मुख हो जाता है, तब उसमें दैवीसम्पत्ति जाग्रत् हो जाती है।
आसुरी सम्पत्ति को ग्रहण करने की अथवा त्याग करने की योग्यता केवल मनुष्य में है। आसुरी सम्पत्ति का त्याग एवं दैवी सम्पदा को धारण करने के लिये ही मनुष्य को मनुष्य योनि प्राप्त होती है। अतः जो मनुष्य आसुरी सम्पत्ति का त्याग एवं दैवी सम्पदा को धारण नहीं करता उसका मनुष्य जीवन व्यर्थ चला जाता है।
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ है। यह चार पुरुषार्थ को करना ही मनुष्य जीवन का उदेश्य है। उद्देश्य इसलिये है क्योंकि इन चार पुरुषार्थ को करने से ही मनुष्य का कल्याण है। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, का अर्थ क्या है? यह पुरुषार्थ करने से मनुष्य का कल्याण किस प्रकार है? धर्म धर्म का अर्थ है कर्तव्य। श्रीमद […]
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