भावार्थ:
आत्मकेन्द्रित एवं स्वार्थी मनुष्य दूसरों का अहित (‘अहिताः’) करनेमें ही लगे रहते हैं और दूसरों का नुकसान करने में ही उनको सुख होता है। उनके कार्य बड़े भयानक (‘उग्रकर्माणः’) होते हैं और वह सरलता से अन्यों का वध कर देते है। उनको अपने से अधिक शक्तिशाली व्यक्ति से तो भय होता है, परन्तु उनको परमात्मा से भय नहीं होता। उनके पास जो शक्ति, ऐश्वर्य, सामर्थ्य, पद, अथवा अधिकार है, वह सब का सब दूसरों का नाश करने में ही लगता है।
वे आसुरी प्रकृतिवाले कभी भी पूरी न होने वाली कामनाओं का आश्रय लेते हैं। उनको पूर्ण विश्वास होता है कि कामना ही मनुष्य की प्रेणना स्रोत्र है, उसके बिना मनुष्य की उन्नति हो ही नहीं सकती। आज जितने भी प्रभावी (नेता, धनी आदि) व्यक्ति है वे सब कामनाके कारण ही हुए हैं।
वे दम्भ, अभिमान और अहंकार को अपनी कामना पूर्ति के लिये बल मानते है।
उनके व्रत (नियम) बड़े अपवित्र होते हैं। जैसे – द्वेष भाव से वह व्रत लेते है की जब तक में अन्य का अहित न कर लू, शान्ति से नहीं बैठूंगा।
अपनी कामना पूर्ति के लिये वे अन्य लोगों का कुछ भी महत्व नहीं समझते और निर्लज्ज, असहिष्णु और क्रूर भाव रख कर वे अपने कार्यक्षेत्र में संघर्षरत रहते हैं।
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ है। यह चार पुरुषार्थ को करना ही मनुष्य जीवन का उदेश्य है। उद्देश्य इसलिये है क्योंकि इन चार पुरुषार्थ को करने से ही मनुष्य का कल्याण है। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, का अर्थ क्या है? यह पुरुषार्थ करने से मनुष्य का कल्याण किस प्रकार है? धर्म धर्म का अर्थ है कर्तव्य। श्रीमद […]
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