भावार्थ:
जितने भी कार्य होते हैं, वे सब अधिष्ठान, कर्ता, करण, चेष्टा और दैव – इन पाँच हेतुओं से ही होते हैं। परन्तु ऐसा होनेपर भी बुद्धि में स्थित विकृति जो स्वयं को चेतना अथवा चेतना का प्रकाशक मानती है और चेतना को शरीर से जोड़ कर देखती है, वह बुद्धि शुद्ध नहीं है।
बुद्धिं से होने वाली क्रिया का प्रकाशक चेतन तत्व है। ‘मैं हूँ’ – इस ज्ञान का प्रकाशक भी चेतन तत्व है, परन्तु इस ज्ञान (‘मैं हूँ’) की अनुभूति बुद्धिं में होती है।
जिस प्रकार इन्द्रियों के विषयों का ज्ञान और मन में उत्त्पन होने वाले भाव का ज्ञान भी बुद्धि को होता है और वह ही इन्द्रियाँ और मन का प्रकाशक है। उसी कारण वश बुद्धि को यह भ्रम होता है कि, स्वयं के होने (‘मैं हूँ’) का ज्ञान जो बुद्धि में हो रहा है उसका प्रकाशक भी बुद्धि है – चेतन तत्व नहीं। और बुद्धि इस चेतना को शरीर से जोड़ कर देखती है।
इसी बुद्धि भ्रम के कारण जड और चेतन का, प्रकृति और पुरुषका जो वास्तविक विवेक है, अलगाव है, उसकी तरफ बुद्धि का ध्यान नहीं जाता। और इस भ्रम-अविवेक के कारण मनुष्य अपने को कर्ता मान लेता है।
विवेक का न होना और भ्रम का बने रहना ही अशुद्ध बुद्धि का वाचक है।
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ है। यह चार पुरुषार्थ को करना ही मनुष्य जीवन का उदेश्य है। उद्देश्य इसलिये है क्योंकि इन चार पुरुषार्थ को करने से ही मनुष्य का कल्याण है। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, का अर्थ क्या है? यह पुरुषार्थ करने से मनुष्य का कल्याण किस प्रकार है? धर्म धर्म का अर्थ है कर्तव्य। श्रीमद […]
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