भावार्थ:
वैसे तो कर्ता भाव अहंकार है, अज्ञान है और परमात्मा प्राप्ति के लिये इसका त्याग आवश्यक है, परन्तु जब तक अहंकार भाव नहीं जाता, तब तक कर्ता मे किस प्रकार के भाव हो, वह इस श्लोक मे दिया है।
पदार्थ, परिस्थिति आदिको लेकर अपने में जो एक विशेषताका अनुभव करना है — यह अहंवदनशीलता है।
यह भी अहंकार है जो स्वयं को लेकर के नहीं, अपितु पदार्थ, परिस्थिति को लेकर के है।
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ है। यह चार पुरुषार्थ को करना ही मनुष्य जीवन का उदेश्य है। उद्देश्य इसलिये है क्योंकि इन चार पुरुषार्थ को करने से ही मनुष्य का कल्याण है। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, का अर्थ क्या है? यह पुरुषार्थ करने से मनुष्य का कल्याण किस प्रकार है? धर्म धर्म का अर्थ है कर्तव्य। श्रीमद […]
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