भावार्थ:
जिस मनुष्य में दृढ़ता के नाम पर केवल अज्ञान, मूढता की ही अधिकता हो, वह केवल निद्रा, भय, चिन्ता, दुःख और घमण्ड को ही धारण करता है। और उस प्रकार की धृति तामसी है।
यहाँ तीसवें से पैंतीसवें श्लोक तक कुल छः श्लोकों में छः बार पार्थ सम्बोधन का प्रयोग करके भगवान् साधक मात्र के प्रतिनिधि अर्जुन को चेताते हैं कि पृथानन्दन लौकिक वस्तुओं और व्यक्तियों के लिये चिन्ता न करके तुम अपने लक्ष्य को दृढ़ता से धारण किये रहो। अपने में कभी भी राजस-तामस भाव न आने पायें, इसके लिये निरन्तर सजग रहो।
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ है। यह चार पुरुषार्थ को करना ही मनुष्य जीवन का उदेश्य है। उद्देश्य इसलिये है क्योंकि इन चार पुरुषार्थ को करने से ही मनुष्य का कल्याण है। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, का अर्थ क्या है? यह पुरुषार्थ करने से मनुष्य का कल्याण किस प्रकार है? धर्म धर्म का अर्थ है कर्तव्य। श्रीमद […]
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