भावार्थ:
अध्याय १३ श्लोक ५ चौबीस तत्त्वोंवाला क्षेत्र बताया गया है। अध्याय १३ श्लोक ६ चार प्रकार के विकार (इच्छा, दुवेश, सुख और दुःख) बताये गये है। अध्याय १३ श्लोक १९ में मूल प्रकृति को सभी कार्यों का कारण बताया है।
इस श्लोक में चौबीस तत्त्वों वाले क्षेत्र में जो पाँच महाभूत रूपी शरीर प्राण के साथ है, उसका यहा ‘अधिष्ठान’ पद दिया है।
चेतन तत्व को ‘कर्ता’ पद दिया है। परन्तु चेतन तत्व कार्य होने का कारण है – प्रकाशक है, कर्ता नहीं है।
दस इन्द्रियाँ (पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ – पाचँ कर्मेन्द्रिय), मन, और बुद्धि को ‘करणं च पृथग्विधम्’ कहा है।
दस इन्द्रियाँ, मन, और बुद्धि से होने वाली क्रिया को ‘विविधाश्च पृथक्चेष्टा’ कहा है।
मूल प्रकृति अथार्त तीन गुण (सत्व, रज, तम), चार विकार, एवं अन्तःकरण में इंगित संस्कार को यहा ‘दैव’ पद दिया है।
यह पाँच ही, कारण है सभी क्रियाओं के होने में और उनकी सिद्धि में।
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ है। यह चार पुरुषार्थ को करना ही मनुष्य जीवन का उदेश्य है। उद्देश्य इसलिये है क्योंकि इन चार पुरुषार्थ को करने से ही मनुष्य का कल्याण है। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, का अर्थ क्या है? यह पुरुषार्थ करने से मनुष्य का कल्याण किस प्रकार है? धर्म धर्म का अर्थ है कर्तव्य। श्रीमद […]
Read More